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प्यारी देवी (अग्रहरी): जब पूर्वांचल की एक महिला ने रचा इतिहास, बनीं गोरखपुर–महाराजगंज की पहली महिला विधायक


भारतीय राजनीति के शुरुआती दौर में महिला नेतृत्व की जब भी बात होती है, तो अक्सर राजघरानों या बड़े शहरों की महिलाओं का नाम ही सामने आता है। लेकिन पूर्वांचल का इतिहास एक अलग ही कहानी बयां करता है। एक ऐसे दौर में जब ग्रामीण महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था, एक महिला ने सामाजिक बंधनों को तोड़कर जनता का नेतृत्व किया।

उनका नाम प्यारी देवी अग्रहरी था। उन्होंने अविभाजित गोरखपुर क्षेत्र (जो अब महाराजगंज जिला है) से पहली महिला विधायक बनकर एक नया इतिहास रचा था। वे न केवल गोरखपुर–महाराजगंज क्षेत्र की पहली महिला विधायक थीं, बल्कि अग्रहरी समाज से विधानसभा तक पहुँचने वाली पहली महिला विधायक भी थीं।

कौन थीं प्यारी देवी (अग्रहरी)

प्यारी देवी (Pyari Devi) एक शांत और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला थीं। उनका विवाह क्षेत्र के जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी और जमीनी राजनेता गौरीराम गुप्ता से हुआ था।

जब गौरीराम गुप्ता आज़ादी की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में लड़ रहे थे, तब प्यारी देवी ने घर-परिवार संभाला और उनके हर फैसले का समर्थन किया। एक समर्पित समाज सुधारक के साथ जीवन बिताने के कारण उनके भीतर भी राजनीतिक चेतना और ग्रामीण मुद्दों की गहरी समझ विकसित हुई।

गौरीराम गुप्ता की राजनीतिक विरासत

प्यारी देवी के राजनीति में प्रवेश को समझने के लिए उनके पति के काम को जानना बेहद जरूरी है। गौरीराम गुप्ता (MLA Gauriram Gupta) स्थानीय राजनीति के एक बड़े स्तंभ थे।

उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया था। जब 1951-1952 में देश के पहले आम चुनाव हुए, तो जनता ने उन्हें फरेंदा विधानसभा क्षेत्र से उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा का सदस्य चुना। गौरीराम गुप्ता ने इस सीट पर तीन बार (1952, 1957 और 1967) जीत दर्ज की। उनकी साफ-सुथरी छवि ने जनता के बीच उनके परिवार के प्रति एक अटूट विश्वास पैदा कर दिया था।

1969 का ऐतिहासिक चुनाव

साल 1969 में फरेंदा क्षेत्र की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस राज्य विधानसभा चुनाव में प्यारी देवी अग्रहरी को अपना उम्मीदवार बनाया।


Former MLA Pyari Devi, w/o Gauram Gupta (MLA)

1960 के दशक के उत्तरार्ध में एक महिला के रूप में चुनाव प्रचार करना बेहद चुनौतीपूर्ण था। उस समय का ग्रामीण समाज काफी रूढ़िवादी था और महिला उम्मीदवारों का होना बहुत दुर्लभ माना जाता था। इन सब चुनौतियों के बावजूद प्यारी देवी ने जनता से सीधा संपर्क साधा और एक मजबूत चुनाव अभियान चलाया।

उन्होंने इस चुनाव में शानदार जीत हासिल की और दो बड़े कीर्तिमान स्थापित किए:

  • वह इस पूरे क्षेत्र के इतिहास में पहली महिला विधायक बनीं।

  • उन्होंने 1969 से 1974 तक फरेंदा निर्वाचन क्षेत्र का सफलतापूर्वक प्रतिनिधित्व किया और ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को सीधे लखनऊ विधानसभा तक पहुँचाया।

उस दौर में जब महिला साक्षरता दर बहुत कम थी और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी, तब विधानसभा में उनकी उपस्थिति ने एक मौन क्रांति का काम किया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि ग्रामीण महिलाएं भी शासन और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी को प्रभावी ढंग से संभाल सकती हैं।

जमीनी नेता और बड़े कारोबारी स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता जी की अनसुनी कहानी

स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता (Late Teerath Prasad Gupta)


 जब भी अग्रहरी समाज के इतिहास और उसकी तरक्की की बात होती है, तो कई ऐसे व्यक्तित्व सामने आते हैं जिन्होंने संघर्ष, मेहनत और ईमानदारी के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई। उन्हीं में से एक अत्यंत सम्मानित नाम है स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता जी का।

अधिकांश लोग उन्हें केवल बड़े कारोबारी घराने श्याम ग्रुप के प्रेरणास्रोत या पूर्व सांसद स्वर्गीय श्याम चरण गुप्ता जी के पिता के रूप में जानते हैं। लेकिन उनका अपना व्यक्तित्व इससे कहीं बड़ा था। वे एक सफल व्यवसायी, लोकप्रिय जमीनी जननेता, अग्रहरी समाज के सम्मानित पदाधिकारी और समाजसेवी थे। उनका जीवन संघर्ष, सेवा, नेतृत्व और दूरदृष्टि की ऐसी मिसाल है, जो आज भी समाज को एकजुट रहने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

जब जनता ने लगातार 5 बार सौंपी ब्लॉक प्रमुख की जिम्मेदारी

आज के समय में राजनीति का स्तर काफी बदल चुका है, लेकिन तीरथ प्रसाद जी उस दौर के नेता थे जब राजनीति सिर्फ जनता के भरोसे और सीधे जुड़ाव पर टिकी होती थी। वे अपने इलाके में इतने लोकप्रिय थे कि लोगों ने उन्हें लगातार 5 बार ब्लॉक प्रमुख चुना।

Teerath Prasad Gupta
पंचायत स्तर पर लगातार पांच बार चुनाव जीतना कोई छोटी बात नहीं होती। यह दिखाता है कि उनका अपने क्षेत्र के आम लोगों, किसानों और छोटे दुकानदारों के साथ कितना गहरा नाता था। वे हर किसी के सुख-दुख में खड़े होने वाले नेता थे। तीरथ जी की इसी जमीनी पकड़ और कार्यकर्ताओं के प्रति उनके प्रेम ने एक ऐसी मजबूत राजनैतिक जमीन तैयार की, जिसके दम पर उनके बेटे श्याम चरण गुप्ता जी आगे चलकर इलाहाबाद और बांदा से सांसद बने और पूरे देश में समाज का नाम रोशन किया।

व्यापारिक साम्राज्य के पीछे की असली प्रेरणा

तीरथ जी का मानना था कि व्यापार सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह समाज के लोगों को रोजगार देने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का एक माध्यम है। उनके इसी नजरिए और मार्गदर्शन की वजह से साल 1973 में उनके परिवार ने 'श्याम ग्रुप ऑफ कंपनीज' की नींव रखी।

शुरुआत बहुत छोटे स्तर पर बीड़ी बनाने (श्याम बीड़ी) के काम से हुई थी। तीरथ जी के अनुभव और सही सलाह के कारण यह काम इतनी तेजी से फैला कि देखते ही देखते यह उत्तर भारत के सबसे बड़े ब्रांड्स में शामिल हो गया। बाद में परिवार ने डेयरी सेक्टर में कदम रखा और 'श्याम डेयरी' की शुरुआत की, जिसने इलाके के हजारों किसानों को सीधे फायदा पहुँचाया। इसके बाद रियल एस्टेट और हॉस्पिटैलिटी में भी काम बढ़ा। इस पूरे सफर में तीरथ जी ने हमेशा एक ही बात सिखाई, काम कोई भी करो, उसमें ईमानदारी और साख सबसे जरूरी है।

साल 2004 का वो खौफनाक वाकया और तीरथ जी का हौसला

तीरथ जी के जीवन का एक ऐसा हिस्सा भी है जो आज भी लोगों के रोंगटे खड़े कर देता है। यह बात जनवरी 2004 की है। उस समय उनकी उम्र काफी ज्यादा थी और उनके बेटे सांसद थे। तीरथ जी मध्य प्रदेश के उमरिया से सतना की तरफ लौट रहे थे, तभी उचेहरा इलाके के पास कुछ हथियारों से लैस अपराधियों ने पुलिस चेकिंग का बहाना बनाकर उनकी गाड़ी को रुकवा लिया। बंदूक की नोक पर बदमाशों ने तीरथ जी और उनके ड्राइवर का अपहरण कर लिया।

अपहरणकर्ताओं ने उन्हें छोड़ने के बदले 5 करोड़ रुपये की भारी फिरौती मांगी थी। उस दौर में इस घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के व्यापारियों और आम जनता को हिलाकर रख दिया था। संकट के इस दौर में पूरे अग्रहरी समाज ने गजब की एकजुटता दिखाई थी और उनकी सुरक्षित वापसी के लिए प्रार्थनाएं की थीं। मामला इतना बड़ा था कि मध्य प्रदेश की एसटीएफ और बिहार पुलिस को मिलकर काम करना पड़ा।

करीब 40 दिनों तक चले लंबे और बेहद तनावपूर्ण ऑपरेशन के बाद पुलिस ने उन्हें बिहार के पटना-औरंगाबाद वाले इलाके से सुरक्षित छुड़ाया। इस पूरे वाकये में सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इतनी ज्यादा उम्र होने और मौत के साए में 40 दिन बिताने के बाद भी तीरथ जी ने अपना मानसिक संतुलन और धैर्य नहीं खोया था। जब वे वापस आए, तो उनके चेहरे की शांति देखकर हर कोई हैरान था।

प्रेरणा

स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता जी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि एक व्यक्ति यदि ईमानदारी, मेहनत और समाजसेवा को अपना लक्ष्य बना ले, तो वह राजनीति, व्यापार और समाज, तीनों क्षेत्रों में अमिट पहचान बना सकता है।

वे एक सफल व्यवसायी, लोकप्रिय जननेता और सादगीपूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे। 


अग्रहरी समाज के गौरव IAS सचिन कुमार वैश्य और उनका जीवन परिचय

IAS Sachin Kumar Vaishya

किसी भी समाज की पहचान उसके संस्कारों और उसकी भावी पीढ़ी की उपलब्धियों से होती है। हमारे अग्रहरी समाज के लिए यह अत्यंत गर्व का विषय है कि समाज के एक होनहार रत्न,
 श्री सचिन कुमार वैश्य जी (IAS Sachin Kumar Vaishy) ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में चयनित होकर न केवल अपने परिवार, बल्कि संपूर्ण समाज का नाम देश के सर्वोच्च स्तर पर रोशन किया है।

उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र का जनपद प्रतापगढ़ की मिट्टी ने देश को कई होनहार अफसर दिए हैं, लेकिन जब कोई युवा बेहद साधारण परिवेश से निकलकर अपनी मेधा और परिश्रम के दम पर देश की सबसे कठिन परीक्षा को पहले ही प्रयास में पास कर ले, तो वह न केवल अपने परिवार का, बल्कि पूरे समाज का गौरव बन जाता है। हम बात कर रहे हैं 2015 बैच के तेजतर्रार आईएएस अधिकारी श्री सचिन कुमार वैश्य की, जो वर्तमान में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (SMVDSB) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के पद पर आसीन हैं।
जड़ें और पारिवारिक पृष्ठभूमि, संघर्ष से सफलता तक
सचिन कुमार वैश्य का जन्म 18 जुलाई 1992 को, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के लालगंज इलाके के छोटे से गांव सांगीपुर में हुआ। उनका परिवार बेहद साधारण है, जो अपनी जड़ों से गहराई तक जुड़ा हुआ है। पिता, श्री अनिल कुमार अग्रहरि, आज भी सांगीपुर बाजार में अपनी छोटी सी दुकान चलाते हैं। इलाके में एक सम्मानित व्यापारी के तौर पर उनकी पहचान है। वहीं, मां, श्रीमती अशोक कुमारी, ने घर-परिवार संभालते हुए अपने बच्चों में ईमानदारी और संस्कारों की मजबूत नींव रखी।
दिलचस्प बात यह है कि सचिन की इस बड़ी सफलता की कहानी में उनके पिता का भी एक सपना छिपा है। स्थानीय लोग बताते हैं कि युवा अनिल जी ने भी कभी पुलिस की वर्दी पहनने का ख्वाब देखा था। उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस में भर्ती होने के लिए खूब मेहनत की, परीक्षा भी दी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, वे पुलिस में शामिल नहीं हो सके। इसी कारण, आज भी क्षेत्र में लोग उन्हें प्यार और सम्मान से 'दरोगा जी' कहकर बुलाते हैं।
भले ही पिता के मन में पुलिस में भर्ती न हो पाने की एक हल्की सी कसक रह गई हो, लेकिन उनके बेटे सचिन ने सीधे IAS अधिकारी बनकर, उस अधूरे सपने को न सिर्फ पूरा किया, बल्कि उसे एक नई बुलंदी दे दी।
अग्रहरी (वैश्य) समाज से आने वाले सचिन जी ने बचपन से ही अपने पिता को कड़ी मेहनत करते देखा। एक व्यापारी परिवार में पले-बढ़े होने के नाते, उन्होंने धैर्य और परिश्रम का महत्व बहुत कम उम्र में ही समझ लिया था। उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि माता-पिता का आशीर्वाद और बच्चों की लगन सच्ची हो, तो संसाधनों की कमी कभी आड़े नहीं आती।
शिक्षा और सिविल सेवा का सफर
सचिन कुमार वैश्य की शैक्षणिक यात्रा किसी भी युवा के लिए प्रेरणास्त्रोत है। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग (B.Tech) में स्नातक की डिग्री हासिल की है और पब्लिक मैनेजमेंट में मास्टर्स (M.A.) भी किया है।
इंजीनियरिंग के दौरान ही उन्होंने देश सेवा का मन बना लिया था। उनकी तैयारी इतनी सटीक और संकल्प इतना दृढ़ था कि वर्ष 2015 की यूपीएससी (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा में उन्होंने मात्र 22 वर्ष की आयु में, अपने पहले ही प्रयास में 94वीं रैंक हासिल कर ली। इतनी कम उम्र में आईएएस बनकर उन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती।
प्रशासनिक कौशल और कार्यशैली
एजीएमयूटी (AGMUT) कैडर के अधिकारी के रूप में सचिन जी ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी हैं।

लेह-लद्दाख: कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया सहमी हुई थी, तब लेह के उपायुक्त (DC) के रूप में सचिन जी ने अद्भुत नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने सुदूर इलाकों तक राशन और दवाइयां पहुंचाईं, जिसकी प्रशंसा स्थानीय जनता आज भी करती है।

जम्मू और उधमपुर: जम्मू और उधमपुर के जिला उपायुक्त (DC) रहते हुए उन्होंने जन-शिकायतों के निवारण के लिए 'जनता दरबार' जैसे प्रयोग किए और प्रशासन को आम आदमी के दरवाजे तक पहुंचाया।

वर्तमान दायित्व : उनकी ईमानदारी और कार्यकुशलता को देखते हुए, अगस्त 2025 में उन्हें श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (Shri Mata Vaishno Devi Shrine Board) का सीईओ नियुक्त किया गया। 

एक अधिकारी के तौर पर आईएएस सचिन कुमार वैश्य जी की पूरा कार्य विवरण 

क्र.सं.पद / स्तरमंत्रालय / विभाग / कार्यालय / स्थानसंगठनअनुभव (मुख्य / गौण)कार्यकाल (से – तक)
1मुख्य कार्यकारी अधिकारी (उप सचिव समकक्ष)माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड, जम्मूकैडर (AIS)लोक प्रशासन / लोक प्रशासन08/08/2025 – वर्तमान तक
2उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, जम्मूकैडर (AIS)भूमि राजस्व प्रबंधन एवं जिला प्रशासन / भूमि अधिग्रहण21/08/2023 – 08/08/2025
3उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, उधमपुरकैडर (AIS)भूमि राजस्व प्रबंधन एवं जिला प्रशासन / जिला प्रशासन01/05/2023 – 21/08/2023
4उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, शोपियांकैडर (AIS)भूमि राजस्व प्रबंधन एवं जिला प्रशासन / जिला प्रशासन18/02/2021 – 30/04/2023
5उपायुक्त एवं जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, लेह (लद्दाख)कैडर (AIS)भूमि राजस्व प्रबंधन एवं जिला प्रशासन / जिला प्रशासन02/08/2019 – 17/07/2021
6अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, लेह (लद्दाख)कैडर (AIS)कानून एवं व्यवस्था / अपराध20/02/2019 – 02/08/2019
7उप कलेक्टर / एस.डी.एम. (जूनियर स्केल)उपमंडल, खाल्त्से (लेह)कैडर (AIS)कानून एवं व्यवस्था / अपराध31/10/2017 – 19/02/2019
8उपलब्ध नहींकैडर (AIS)30/09/2017 – वर्तमान तक
9सहायक सचिव (जूनियर स्केल)पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, केंद्रजल संसाधनजल संसाधन / पेयजल03/07/2017 – 29/09/2017
10प्रशिक्षणाधीन (जूनियर स्केल)कैडर (AIS)लागू नहीं / उपलब्ध नहीं07/09/2015 – 29/09/2017


सचिन वैश्य जी को वर्ष 2023 में जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा लोक प्रशासन के क्षेत्र में उत्कृष्ट सार्वजनिक सेवा हेतु राज्य स्तरीय “मेरिटोरियस पब्लिक सर्विस अवॉर्ड” से नवाज़ा गया।

सचिन जी अपनी जड़ों को कभी नहीं भूले। उन्होंने सरकारी दस्तावेजों में अपने नाम को "सचिन कुमार वैश्य" के रूप में दर्ज कराकर अपनी सामाजिक पहचान को गर्व के साथ स्थापित किया है।
 
आज अग्रहरी समाज को अपने इस लाल पर गर्व है। सचिन कुमार वैश्य जी हमारे समाज के हजारों युवाओं के लिए एक चलती-फिरती प्रेरणा हैं। हम, हमारा अग्रहरी समाज, IAS सचिन की उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। ईश्वर उन्हें और अधिक शक्ति दे ताकि वे इसी तरह समाज और राष्ट्र की सेवा करते रहें।

अग्रहरि गौरव: फतेहपुर में भाजपा का कमल खिलाने वाले अग्रहरि नेता पूर्व मंत्री बाबू राधेश्याम गुप्ता


फतेहपुर की राजनीति की बात होती है तो कुछ नाम अपने आप सामने आ जाते हैं। उन्हीं में एक नाम है राधेश्याम गुप्ता। वे उन नेताओं में से हैं जिन्होंने राजनीति को केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि संगठन, कार्यकर्ताओं और जनता के साथ लगातार जुड़ाव बनाए रखा। जिस दौर में उत्तर प्रदेश की राजनीति अस्थिरता और बदलाव से गुजर रही थी, उस समय फतेहपुर में भाजपा को मजबूती देने वालों में उनका योगदान अहम रहा।

राधेश्याम गुप्ता का जन्म 5 मार्च 1935 को फतेहपुर जनपद में हुआ। उनके माता-पिता सादा जीवन जीने वाले, अनुशासन और मेहनत में विश्वास रखने वाले लोग थे। घर का माहौल ऐसा था जहाँ जिम्मेदारी और समाज के प्रति सोच स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और शुरुआती वर्षों में व्यवसाय से जुड़े। यही व्यावसायिक अनुभव आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन में काम आया, लोगों को समझना, निर्णय लेना और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना।

1990 का दशक देश और प्रदेश दोनों के लिए बड़ा बदलाव लेकर आया। कांग्रेस का दबदबा कमजोर हो रहा था और राजनीति में वैचारिक साफ़गोई की मांग बढ़ रही थी। इसी समय भाजपा और संघ से जुड़ा संगठनात्मक काम तेज़ हुआ। फतेहपुर में भी राजनीति किसी एक दिशा में नहीं थी। ऐसे माहौल में राधेश्याम गुप्ता भाजपा के उन नेताओं में उभरे जो जमीन से जुड़े थे, कार्यकर्ताओं के बीच रहते थे और संगठन की बात समझते थे। पार्टी में उन्हें एक भरोसेमंद व्यक्ति माना जाने लगा। उस समय के बड़े नेता, खासकर अटल बिहारी वाजपेयी, उन्हें गंभीरता से लेते थे। वें अटल बिहारी वाजपेयी के काफी करीबी माने जाते थें। 

1991 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। वे संगठन के काम में और ज़्यादा सक्रिय हुए। 1993 का चुनाव फतेहपुर के लिए यादगार साबित हुआ। बाबरी विध्वंस के बाद देशभर में रामलहर साफ़ दिखाई दे रही थी। भाजपा ने उन्हें फतेहपुर सदर से उम्मीदवार बनाया। उस चुनाव में एक दिलचस्प दृश्य था, एक तरफ भाजपा के लिए अटल बिहारी वाजपेयी की सभा और दूसरी तरफ कांग्रेस के समर्थन में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की रैली। अटल जी की सभा ने माहौल बदल दिया और राधेश्याम गुप्ता पहली बार विधायक बने। उसी चुनाव के साथ फतेहपुर में भाजपा का कमल पहली बार खिला।

इसके बाद 1996 में उन्होंने दोबारा जीत हासिल की। जनता का भरोसा उनके साथ था। 2002 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 2007 में वे फिर से विधानसभा पहुँचे। यह बताता है कि वे केवल किसी एक लहर के नेता नहीं थे। उनकी प्रशासनिक समझ को देखते हुए उन्हें कल्याण सिंह सरकार में संस्थागत वित्त मंत्री बनाया गया। बाद में राजनाथ सिंह सरकार के समय उन्होंने कानून और न्याय से जुड़े दायित्व भी संभाले। ये जिम्मेदारियाँ उनके अनुभव और संतुलन का प्रमाण थीं।

वे ज़्यादा बोलने से ज़्यादा काम करने में विश्वास रखते थे। संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को साथ रखना और क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान देना, यही उनकी शैली रही। सामाजिक स्तर पर भी वे जुड़े रहे और अपने समुदाय सहित आसपास के लोगों से निरंतर संवाद बनाए रखा। उन्होंने यह दिखाया कि राजनीति में रहते हुए समाज से दूरी बनाना ज़रूरी नहीं है।

आज उनकी राजनीतिक यात्रा को उनके पुत्र विकास गुप्ता आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्होंने लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर जनता का भरोसा कायम रखा है। यह भरोसा केवल एक नाम का नहीं, बल्कि उस काम और व्यवहार का परिणाम है जो वर्षों से लोगों ने देखा है।

फतेहपुर की राजनीति में भाजपा की जो जगह आज दिखती है, उसकी नींव रखने वालों में राधेश्याम गुप्ता का नाम हमेशा लिया जाएगा। वे आज भी एक ऐसे नेता के रूप में याद किए जाते हैं जिन्होंने कठिन समय में संगठन का साथ दिया और क्षेत्र को एक स्पष्ट राजनीतिक दिशा देने में भूमिका निभाई।