प्यारी देवी (अग्रहरी): जब पूर्वांचल की एक महिला ने रचा इतिहास, बनीं गोरखपुर–महाराजगंज की पहली महिला विधायक


भारतीय राजनीति के शुरुआती दौर में महिला नेतृत्व की जब भी बात होती है, तो अक्सर राजघरानों या बड़े शहरों की महिलाओं का नाम ही सामने आता है। लेकिन पूर्वांचल का इतिहास एक अलग ही कहानी बयां करता है। एक ऐसे दौर में जब ग्रामीण महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था, एक महिला ने सामाजिक बंधनों को तोड़कर जनता का नेतृत्व किया।

उनका नाम प्यारी देवी अग्रहरी था। उन्होंने अविभाजित गोरखपुर क्षेत्र (जो अब महाराजगंज जिला है) से पहली महिला विधायक बनकर एक नया इतिहास रचा था। वे न केवल गोरखपुर–महाराजगंज क्षेत्र की पहली महिला विधायक थीं, बल्कि अग्रहरी समाज से विधानसभा तक पहुँचने वाली पहली महिला विधायक भी थीं।

कौन थीं प्यारी देवी (अग्रहरी)

प्यारी देवी (Pyari Devi) एक शांत और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला थीं। उनका विवाह क्षेत्र के जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी और जमीनी राजनेता गौरीराम गुप्ता से हुआ था।

जब गौरीराम गुप्ता आज़ादी की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में लड़ रहे थे, तब प्यारी देवी ने घर-परिवार संभाला और उनके हर फैसले का समर्थन किया। एक समर्पित समाज सुधारक के साथ जीवन बिताने के कारण उनके भीतर भी राजनीतिक चेतना और ग्रामीण मुद्दों की गहरी समझ विकसित हुई।

गौरीराम गुप्ता की राजनीतिक विरासत

प्यारी देवी के राजनीति में प्रवेश को समझने के लिए उनके पति के काम को जानना बेहद जरूरी है। गौरीराम गुप्ता (MLA Gauriram Gupta) स्थानीय राजनीति के एक बड़े स्तंभ थे।

उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया था। जब 1951-1952 में देश के पहले आम चुनाव हुए, तो जनता ने उन्हें फरेंदा विधानसभा क्षेत्र से उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा का सदस्य चुना। गौरीराम गुप्ता ने इस सीट पर तीन बार (1952, 1957 और 1967) जीत दर्ज की। उनकी साफ-सुथरी छवि ने जनता के बीच उनके परिवार के प्रति एक अटूट विश्वास पैदा कर दिया था।

1969 का ऐतिहासिक चुनाव

साल 1969 में फरेंदा क्षेत्र की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस राज्य विधानसभा चुनाव में प्यारी देवी अग्रहरी को अपना उम्मीदवार बनाया।


Former MLA Pyari Devi, w/o Gauram Gupta (MLA)

1960 के दशक के उत्तरार्ध में एक महिला के रूप में चुनाव प्रचार करना बेहद चुनौतीपूर्ण था। उस समय का ग्रामीण समाज काफी रूढ़िवादी था और महिला उम्मीदवारों का होना बहुत दुर्लभ माना जाता था। इन सब चुनौतियों के बावजूद प्यारी देवी ने जनता से सीधा संपर्क साधा और एक मजबूत चुनाव अभियान चलाया।

उन्होंने इस चुनाव में शानदार जीत हासिल की और दो बड़े कीर्तिमान स्थापित किए:

  • वह इस पूरे क्षेत्र के इतिहास में पहली महिला विधायक बनीं।

  • उन्होंने 1969 से 1974 तक फरेंदा निर्वाचन क्षेत्र का सफलतापूर्वक प्रतिनिधित्व किया और ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को सीधे लखनऊ विधानसभा तक पहुँचाया।

उस दौर में जब महिला साक्षरता दर बहुत कम थी और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी, तब विधानसभा में उनकी उपस्थिति ने एक मौन क्रांति का काम किया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि ग्रामीण महिलाएं भी शासन और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी को प्रभावी ढंग से संभाल सकती हैं।

जमीनी नेता और बड़े कारोबारी स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता जी की अनसुनी कहानी

स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता (Late Teerath Prasad Gupta)


 जब भी अग्रहरी समाज के इतिहास और उसकी तरक्की की बात होती है, तो कई ऐसे व्यक्तित्व सामने आते हैं जिन्होंने संघर्ष, मेहनत और ईमानदारी के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई। उन्हीं में से एक अत्यंत सम्मानित नाम है स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता जी का।

अधिकांश लोग उन्हें केवल बड़े कारोबारी घराने श्याम ग्रुप के प्रेरणास्रोत या पूर्व सांसद स्वर्गीय श्याम चरण गुप्ता जी के पिता के रूप में जानते हैं। लेकिन उनका अपना व्यक्तित्व इससे कहीं बड़ा था। वे एक सफल व्यवसायी, लोकप्रिय जमीनी जननेता, अग्रहरी समाज के सम्मानित पदाधिकारी और समाजसेवी थे। उनका जीवन संघर्ष, सेवा, नेतृत्व और दूरदृष्टि की ऐसी मिसाल है, जो आज भी समाज को एकजुट रहने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

जब जनता ने लगातार 5 बार सौंपी ब्लॉक प्रमुख की जिम्मेदारी

आज के समय में राजनीति का स्तर काफी बदल चुका है, लेकिन तीरथ प्रसाद जी उस दौर के नेता थे जब राजनीति सिर्फ जनता के भरोसे और सीधे जुड़ाव पर टिकी होती थी। वे अपने इलाके में इतने लोकप्रिय थे कि लोगों ने उन्हें लगातार 5 बार ब्लॉक प्रमुख चुना।

Teerath Prasad Gupta
पंचायत स्तर पर लगातार पांच बार चुनाव जीतना कोई छोटी बात नहीं होती। यह दिखाता है कि उनका अपने क्षेत्र के आम लोगों, किसानों और छोटे दुकानदारों के साथ कितना गहरा नाता था। वे हर किसी के सुख-दुख में खड़े होने वाले नेता थे। तीरथ जी की इसी जमीनी पकड़ और कार्यकर्ताओं के प्रति उनके प्रेम ने एक ऐसी मजबूत राजनैतिक जमीन तैयार की, जिसके दम पर उनके बेटे श्याम चरण गुप्ता जी आगे चलकर इलाहाबाद और बांदा से सांसद बने और पूरे देश में समाज का नाम रोशन किया।

व्यापारिक साम्राज्य के पीछे की असली प्रेरणा

तीरथ जी का मानना था कि व्यापार सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह समाज के लोगों को रोजगार देने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का एक माध्यम है। उनके इसी नजरिए और मार्गदर्शन की वजह से साल 1973 में उनके परिवार ने 'श्याम ग्रुप ऑफ कंपनीज' की नींव रखी।

शुरुआत बहुत छोटे स्तर पर बीड़ी बनाने (श्याम बीड़ी) के काम से हुई थी। तीरथ जी के अनुभव और सही सलाह के कारण यह काम इतनी तेजी से फैला कि देखते ही देखते यह उत्तर भारत के सबसे बड़े ब्रांड्स में शामिल हो गया। बाद में परिवार ने डेयरी सेक्टर में कदम रखा और 'श्याम डेयरी' की शुरुआत की, जिसने इलाके के हजारों किसानों को सीधे फायदा पहुँचाया। इसके बाद रियल एस्टेट और हॉस्पिटैलिटी में भी काम बढ़ा। इस पूरे सफर में तीरथ जी ने हमेशा एक ही बात सिखाई, काम कोई भी करो, उसमें ईमानदारी और साख सबसे जरूरी है।

साल 2004 का वो खौफनाक वाकया और तीरथ जी का हौसला

तीरथ जी के जीवन का एक ऐसा हिस्सा भी है जो आज भी लोगों के रोंगटे खड़े कर देता है। यह बात जनवरी 2004 की है। उस समय उनकी उम्र काफी ज्यादा थी और उनके बेटे सांसद थे। तीरथ जी मध्य प्रदेश के उमरिया से सतना की तरफ लौट रहे थे, तभी उचेहरा इलाके के पास कुछ हथियारों से लैस अपराधियों ने पुलिस चेकिंग का बहाना बनाकर उनकी गाड़ी को रुकवा लिया। बंदूक की नोक पर बदमाशों ने तीरथ जी और उनके ड्राइवर का अपहरण कर लिया।

अपहरणकर्ताओं ने उन्हें छोड़ने के बदले 5 करोड़ रुपये की भारी फिरौती मांगी थी। उस दौर में इस घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के व्यापारियों और आम जनता को हिलाकर रख दिया था। संकट के इस दौर में पूरे अग्रहरी समाज ने गजब की एकजुटता दिखाई थी और उनकी सुरक्षित वापसी के लिए प्रार्थनाएं की थीं। मामला इतना बड़ा था कि मध्य प्रदेश की एसटीएफ और बिहार पुलिस को मिलकर काम करना पड़ा।

करीब 40 दिनों तक चले लंबे और बेहद तनावपूर्ण ऑपरेशन के बाद पुलिस ने उन्हें बिहार के पटना-औरंगाबाद वाले इलाके से सुरक्षित छुड़ाया। इस पूरे वाकये में सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इतनी ज्यादा उम्र होने और मौत के साए में 40 दिन बिताने के बाद भी तीरथ जी ने अपना मानसिक संतुलन और धैर्य नहीं खोया था। जब वे वापस आए, तो उनके चेहरे की शांति देखकर हर कोई हैरान था।

प्रेरणा

स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता जी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि एक व्यक्ति यदि ईमानदारी, मेहनत और समाजसेवा को अपना लक्ष्य बना ले, तो वह राजनीति, व्यापार और समाज, तीनों क्षेत्रों में अमिट पहचान बना सकता है।

वे एक सफल व्यवसायी, लोकप्रिय जननेता और सादगीपूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे। 


नवी मुंबई में है 'अग्रहरि मार्ग'


मुंबई के वाशी सेक्टर-26 में लगा
"अग्रहरि मार्ग" का नामपट्ट देखते ही हर अग्रहरि के मन में गर्व का भाव स्वाभाविक रूप से उमड़ पड़ता है। देश के एक प्रमुख शहर में अपने समाज के नाम पर किसी सड़क का होना केवल एक पहचान नहीं, बल्कि वर्षों के सामूहिक प्रयासों और सामाजिक सहभागिता का परिणाम है। नवी मुंबई महानगरपालिका द्वारा किया गया यह नामकरण आज शहर के आधिकारिक अभिलेखों और मानचित्रों का हिस्सा है तथा अग्रहरि समाज के इतिहास की उल्लेखनीय उपलब्धियों में गिना जाता है।

वर्ष 2021 में नवी मुंबई महानगरपालिका द्वारा 'अग्रहरि मार्ग' का आधिकारिक नामकरण किया गया। इसी अवसर पर मार्ग की नामपट्टिका का अनावरण भी किया गया। 

कहाँ स्थित है अग्रहरि मार्ग?


अग्रहरि मार्ग (Agrahari Marg) महाराष्ट्र के नवी मुंबई शहर के वाशी सेक्टर-26 में स्थित है।

स्थान विवरण:

  • मार्ग का नाम: अग्रहरि मार्ग (Agrahari Marg)
  • क्षेत्र: सेक्टर-26, वाशी
  • शहर: नवी मुंबई
  • राज्य: महाराष्ट्र
  • पिन कोड: 400703

एक उपलब्धि

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अग्रहरि समाज विकास सेवा संस्था, मुंबई के प्रयासों से नवी मुंबई महानगरपालिका ने इस सड़क का नाम "अग्रहरि मार्ग" रखा। आज यह नाम सरकारी अभिलेखों, पते और डिजिटल मानचित्रों में दर्ज है।

अग्रहरि समाज के लिए यह केवल एक सड़क का नाम नहीं, बल्कि समाज की पहचान से जुड़ी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। नवी मुंबई आने वाले समाज के लोगों के लिए अग्रहरि मार्ग आज भी गर्व और अपनत्व का एहसास कराता है।


अग्रहरि गौरव: पहले ही प्रयास में न्यायिक सेवा में चयन, फिर हाईकोर्ट की न्यायपीठ तक पहुँचे, जानिए न्यायमूर्ति शरद कुमार गुप्ता (अग्रहरि) का जीवन और योगदान


भारतीय न्यायपालिका में ऐसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपने कार्य से अपनी अलग पहचान बनाई। न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता अग्रहरि भी उन्हीं में से एक हैं। लगभग चार दशक तक न्यायिक सेवा में रहते हुए उन्होंने सिविल न्यायाधीश, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश, राज्यपाल के विधिक सलाहकार, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा बाद में छत्तीसगढ़ भू संपदा अपीलीय अधिकरण (CG Real Estate Appellate Tribunal) के प्रथम अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया।

अग्रहरि समाज से आने वाले न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता का जन्म 14 अप्रैल 1959 को राजनांदगांव (वर्तमान छत्तीसगढ़) में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय श्री बी. एस. गुप्ता जिला एवं सत्र न्यायाधीश थे। परिवार में न्यायिक सेवा की परंपरा थी, जिसने प्रारंभ से ही उनके व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि को प्रभावित किया।

प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्होंने रीवा स्थित अवधेश प्रताप विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में विज्ञान स्नातक (बी.एससी.) तथा जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से प्रथम श्रेणी में एल.एल.बी. की उपाधि प्राप्त की। विधि की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने न्यायिक सेवा को अपना लक्ष्य बनाया और वर्ष 1985 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा परीक्षा प्रथम प्रयास में उत्तीर्ण कर सिविल न्यायाधीश के रूप में अपने करियर की शुरुआत की।

न्यायिक सेवा का यह प्रारंभ आगे चलकर एक लंबे और विविध अनुभवों से भरे सफर में बदल गया। लगभग बत्तीस वर्षों तक उन्होंने न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर कार्य किया। इस दौरान वे सिविल न्यायाधीश, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश तथा प्रधान न्यायाधीश (परिवार न्यायालय) रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने आर्थिक अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ (Economic Offences Wing - EOW) के विधिक सलाहकार तथा छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के विधिक सलाहकार के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं। न्यायिक कार्य के साथ-साथ प्रशासनिक दायित्वों का यह अनुभव उनके व्यावसायिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता रहा।

उनकी सेवाओं और अनुभव को देखते हुए 27 जून 2017 को उन्हें छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। इसके बाद 2 सितम्बर 2019 को वे उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश बने। उच्च न्यायालय में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने दीवानी, आपराधिक, संवैधानिक तथा प्रशासनिक कानून से जुड़े अनेक मामलों की सुनवाई की। मार्च 2021 तक वे न्यायिक दायित्वों का निर्वहन करते रहे।

उच्च न्यायालय से कार्यमुक्त होने के बाद छत्तीसगढ़ शासन ने उन्हें छत्तीसगढ़ भू संपदा अपीलीय अधिकरण (CGREAT) का प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया। रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 के तहत गठित यह अधिकरण राज्य में रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) के आदेशों के विरुद्ध दायर अपीलों की सुनवाई करता है। न्यायमूर्ति श्री गुप्ता के कार्यकाल में अधिकरण की संस्थागत कार्यप्रणाली को व्यवस्थित रूप मिला। 2 जुलाई 2022 को रायपुर के मौलश्री विहार स्थित अधिकरण के नवीन भवन का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने वर्चुअल माध्यम से किया।

न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता का परिवार भी शिक्षा और सार्वजनिक सेवा से जुड़ा रहा है। उनकी पत्नी श्रीमती मंजूषा गुप्ता सामाजिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों में सक्रिय रही हैं तथा समय-समय पर महिलाओं के लिए योग प्रशिक्षण कार्यक्रमों से भी जुड़ी रही हैं। उनके पुत्र एडवोकेट श्रेष्ठ अग्रहरि विधि व्यवसाय से जुड़े हैं, जबकि पुत्री एडवोकेट समीक्षा गुप्ता अग्रहरि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत रही हैं।

उनके छोटे भाई श्री सुधीर कुमार गुप्ता भारतीय रेल में वरिष्ठ अभियंता रहे और आगे चलकर बिलासपुर रेलवे जोन में प्रिंसिपल चीफ इंजीनियर तथा बाद में जबलपुर रेलवे जोन के महाप्रबंधक (जनरल मैनेजर) के पद तक पहुँचे। दूसरे छोटे भाई डॉ. संजय कुमार गुप्ता चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े रहे हैं।

अग्रहरि समाज के इतिहास में न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता का नाम एक विशेष उपलब्धि के साथ दर्ज है। उपलब्ध सामुदायिक अभिलेखों के अनुसार वे अग्रहरि समाज से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने वाले प्रथम व्यक्ति हैं। उनकी यह उपलब्धि समाज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जाती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का विषय है।

सिविल न्यायाधीश के रूप में शुरू हुई न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता अग्रहरि की यात्रा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और आगे चलकर छत्तीसगढ़ भू संपदा अपीलीय अधिकरण के प्रथम अध्यक्ष तक पहुँची। न्यायिक सेवा के विभिन्न स्तरों पर उनका अनुभव, प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन और संस्थागत विकास में उनकी भूमिका भारतीय न्यायपालिका में उनके दीर्घ योगदान को रेखांकित करती है। उनके जीवन का यह सफर इस बात का उदाहरण है कि निरंतर अध्ययन, अनुशासन, निष्पक्षता और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर सार्वजनिक जीवन में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया जा सकता है।

अग्रहरि समाज की साहित्यिक एवं पत्रिका परंपरा



आज जब संचार के अनगिनत आधुनिक माध्यम हमारे पास उपलब्ध हैं, तब शायद यह कल्पना करना कठिन है कि एक समय ऐसा भी था जब समाज को एक सूत्र में बाँधने, विचारों का आदान-प्रदान करने और सामाजिक चेतना को जीवित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम केवल पत्र और पत्रिकाएँ हुआ करती थीं। संवाद किसी भी समाज को संगठित करता है, उसकी संस्कृति को सुरक्षित रखता है और आने वाली पीढ़ियों तक उसके विचारों को पहुँचाता है। इसी संवाद को सशक्त बनाए रखने के लिए अग्रहरि समाज के दूरदर्शी पूर्वजों ने समय-समय पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया।

अग्रहरि समाज इस दृष्टि से सदैव दूरदर्शी रहा है। हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले यह समझ लिया था कि यदि समाज को संगठित रखना है, सामाजिक गतिविधियों का प्रचार-प्रसार करना है, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना है और देश के विभिन्न भागों में रहने वाले अग्रहरि परिवारों के बीच निरंतर संवाद बनाए रखना है, तो इसके लिए एक सशक्त माध्यम आवश्यक होगा। इसी सोच ने अग्रहरि समाज में पत्र-पत्रिकाओं की एक समृद्ध परंपरा को जन्म दिया।

इन पत्रिकाओं का उद्देश्य केवल समाचार प्रकाशित करना नहीं था। वे समाज के विचारों का मंच थीं, सामाजिक सुधार का माध्यम थीं, साहित्यिक अभिव्यक्ति का अवसर थीं और पूरे देश में फैले अग्रहरि समाज को एक सूत्र में बाँधने का सशक्त साधन थीं। विवाह, शिक्षा, समाज सुधार, धार्मिक आयोजन, व्यापार, युवाओं की उपलब्धियाँ, साहित्य, इतिहास, प्रेरक व्यक्तित्व और सामाजिक संदेश, जीवन का शायद ही कोई ऐसा पक्ष रहा हो जिसे इन पत्रिकाओं ने स्पर्श न किया हो।

यह भी उल्लेखनीय है कि अग्रहरि समाज की पत्रिका परंपरा केवल समाज के इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि भारतीय पत्र-पत्रिका इतिहास के अध्ययन में भी अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों से लेकर आज तक समाज द्वारा निरंतर पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन इस बात का प्रमाण है कि सामुदायिक पत्रकारिता भारत की सामाजिक चेतना का एक महत्वपूर्ण आधार रही है। उस समय जब संचार के संसाधन सीमित थे, तब समाज के स्वयंसेवियों, साहित्यकारों और संपादकों ने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से इन पत्रिकाओं का प्रकाशन कर ज्ञान, संवाद और संगठन की ऐसी परंपरा स्थापित की, जो आज भी प्रेरणा देती है।
शुरुआत जिसने इतिहास रचा

अग्रहरि समाज की संगठित पत्रकारिता की शुरुआत जनवरी 1921 में हुई, जब बिहार के मोतिहारी से स्वर्गीय वैद्यनाथ प्रसाद गुप्त 'विदेह' के संपादन में "अग्रहरि सेवक" मासिक पत्रिका प्रकाशित हुई। यह केवल समाज की पहली पत्रिका नहीं थी, बल्कि एक ऐसे वैचारिक आंदोलन का प्रारंभ थी जिसने आने वाले दशकों की दिशा निर्धारित की।

इसके बाद 1923 में स्वर्गीय गंगा सहाय गुप्त जी ने "अग्रहरि बंधु" मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। वर्ष 1925 में तत्कालीन इलाहाबाद से स्वर्गीय भवानी प्रसाद गुप्ता जी के संपादन में "अग्रहरि जीवन" पाक्षिक पत्रिका प्रकाशित हुई। दो वर्ष बाद, 1927 में जौनपुर से स्वर्गीय रामनाथ मुनीम जी के संपादन में "अग्रहरि मित्र" का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।

दिसंबर 1931 में स्वर्गीय वैद्यनाथ प्रसाद गुप्त 'विदेह' ने मोतिहारी से "विकास" मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया। वर्ष 1938 में इलाहाबाद से स्वर्गीय भवानी प्रसाद हिप्स जी के संपादन में "अग्रहरि जीवन" मासिक तथा मार्च 1938 में स्वर्गीय मसूरियादीन गुप्त अग्रहरि के संपादन में "अग्रहरि मित्र" मासिक प्रकाशित हुई। नवंबर 1940 में रायबरेली से स्वर्गीय रामकृष्ण गुप्त अग्रहरि के संपादन में "अग्रहरि दूत" प्रकाशित हुई, जबकि 1941 में राजनांदगाँव से "अग्रहरि प्रचार पत्र" का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।
स्वतंत्रता के बाद नई ऊर्जा

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद समाज में शिक्षा, संगठन और सामाजिक जागरूकता के नए आयाम जुड़े। जनवरी 1959 में गोरखपुर से श्रीमती गायत्री देवी जी के संपादन में "अग्रहरि ज्योति" प्रकाशित हुई। वर्ष 1962 में राजनांदगाँव से "अग्रहरि प्रभाकर" का प्रकाशन हुआ।

जनवरी 1966 अग्रहरि समाज की पत्रकारिता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुआ। इसी वर्ष श्री कैलाश चंद्र जी द्वारा "अग्रहरि समाज" मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। समय के साथ यह पत्रिका समाज की सबसे प्रमुख और व्यापक पत्रिका बन गई। पिछले छह दशकों से भी अधिक समय से इसका नियमित प्रकाशन जारी है। कानपुर, जबलपुर, मिर्जापुर, दिल्ली, सतना और वर्तमान में प्रयागराज से इसका प्रकाशन होता रहा है तथा इसका वितरण देशभर में किया जाता है। निरंतरता, विषय-वस्तु और गुणवत्ता के कारण यह पत्रिका आज भी अग्रहरि समाज की सबसे प्रतिष्ठित सामाजिक पत्रिकाओं में गिनी जाती है।

वर्ष 1967 में जबलपुर से बाबू लक्ष्मण प्रसाद जी द्वारा "अग्रहरि मिलाप" त्रैमासिक तथा अप्रैल 1967 में बख्तियारपुर (पटना) से श्रीमती सावित्री देवी राजकुमार गुप्ता अग्रहरि के संपादन में "अग्रहरि संदेश" त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।
नई पीढ़ी और नई दिशा

समय बदलता गया, लेकिन समाज की साहित्यिक चेतना कभी रुकी नहीं। मई 1992 में जबलपुर से इंजीनियर गणेश जी द्वारा "अग्रहरि वाणी" मासिक पत्रिका प्रकाशित हुई। वर्ष 2004 में महाराष्ट्र के परतवाड़ा, जनपद अमरावती, से श्री देवेंद्र कुमार के संपादन में "अग्रहरि संदेश" मासिक का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।

इसके बाद वर्ष 2005 में स्वर्गीय प्रेम प्रकाश शास्त्री जी द्वारा जबलपुर से "संस्कार सौरभ", वर्ष 2006 में श्री किशन नारायण जी के संपादन में "संस्कार समुच्चय", तथा वर्ष 2009 में कानपुर से श्री सोमचंद जी के स्वामित्व एवं श्री नंदलाल जी तथा श्री राधेश्याम जी के संपादन में "अग्रहरि परिवार" मासिक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। बाद में "अग्रहरि परिवार" का विलय "अग्रहरि समाज" पत्रिका में कर दिया गया।

केवल पत्रिकाएँ नहीं, समाज की जीवंत स्मृति

इन सभी पत्रिकाओं को यदि एक साथ देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि ये केवल प्रकाशन नहीं थीं। ये समाज का इतिहास थीं, समाज की स्मृति थीं और समाज की आवाज़ थीं। इन्होंने उन घटनाओं को सुरक्षित रखा जो अन्यथा समय के साथ विलुप्त हो सकती थीं। आज यदि हम बीते दशकों के सामाजिक आयोजनों, व्यक्तित्वों, विचारों और उपलब्धियों को जान पाते हैं, तो उसमें इन पत्रिकाओं का अमूल्य योगदान है।

इन पत्रिकाओं ने समाज में साहित्यिक लेखन को प्रोत्साहन दिया, युवा लेखकों को मंच दिया, सामाजिक सुधारों पर चर्चा की, शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों का परिचय नई पीढ़ी से कराया। उन्होंने देश के अलग-अलग राज्यों में बसे अग्रहरि परिवारों के बीच आत्मीय संबंध बनाए रखने का कार्य किया और एक ऐसी वैचारिक एकता स्थापित की, जो भौगोलिक दूरियों से कहीं अधिक मजबूत थी।

भारतीय पत्रकारिता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण विरासत
अग्रहरि समाज की पत्रिकाएँ केवल समाज की धरोहर नहीं हैं। भारतीय सामुदायिक पत्रकारिता और पत्र-पत्रिका इतिहास के संदर्भ में भी इनका विशेष महत्व है। लगभग एक शताब्दी से अधिक समय तक निरंतर प्रकाशित होती रही इतनी बड़ी पत्रिका परंपरा किसी भी समुदाय के लिए गर्व का विषय है। यह इस बात का प्रमाण है कि अग्रहरि समाज ने शिक्षा, साहित्य, संगठन और सामाजिक जागरूकता को सदैव सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

आज जब सूचना का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है, तब भी इन पत्रिकाओं की विरासत उतनी ही प्रेरणादायक है। इन्होंने यह सिद्ध किया कि समाज को मजबूत बनाने के लिए केवल संगठन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि निरंतर संवाद, विचारों का आदान-प्रदान और ज्ञान का प्रसार भी उतना ही आवश्यक है।

अग्रहरि समाज की पत्रिकाओं का इतिहास वास्तव में समाज की सामूहिक चेतना, संगठन, साहित्य, सेवा और समर्पण का इतिहास है। यह उन दूरदर्शी पूर्वजों को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि भी है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद कलम को समाज की सबसे बड़ी शक्ति बनाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए विचारों की ऐसी अमूल्य धरोहर छोड़ गए, जिस पर प्रत्येक अग्रहरि परिवार को गर्व होना चाहिए।

अग्रहरि समाज की प्रमुख पत्रिकाओं का कालक्रम

क्रमांक

पत्रिका का नाम

प्रारंभ वर्ष

आवृत्ति

संपादक

प्रकाशन स्थल

1

अग्रहरि सेवक

जनवरी 1921

मासिक

स्व. वैद्यनाथ प्रसाद गुप्त 'विदेह'

मोतिहारी, बिहार

2

अग्रहरि बंधु

1923

मासिक

स्व. गंगा सहाय गुप्त

उपलब्ध नहीं

3

अग्रहरि जीवन

1925

पाक्षिक

स्व. भवानी प्रसाद गुप्ता

इलाहाबाद

4

अग्रहरि मित्र

1927

पाक्षिक

स्व. रामनाथ मुनीम

जौनपुर

5

विकास

दिसंबर 1931

मासिक

स्व. वैद्यनाथ प्रसाद गुप्त 'विदेह'

मोतिहारी, बिहार

6

अग्रहरि जीवन

1938

मासिक

स्व. भवानी प्रसाद हिप्स

इलाहाबाद

7

अग्रहरि मित्र

मार्च 1938

मासिक

स्व. मसूरियादीन गुप्त अग्रहरि

इलाहाबाद

8

अग्रहरि दूत

नवंबर 1940

मासिक

स्व. रामकृष्ण गुप्त अग्रहरि

रायबरेली

9

अग्रहरि प्रचार पत्र

1941

मासिक

जानकारी उपलब्ध नहीं

राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़

10

अग्रहरि ज्योति

जनवरी 1959

मासिक

श्रीमती गायत्री देवी

गोरखपुर

11

अग्रहरि प्रभाकर

1962

जानकारी उपलब्ध नहीं

जानकारी उपलब्ध नहीं

राजनांदगाँव

12

अग्रहरि समाज

जनवरी 1966

मासिक

श्री कैलाश चंद्र

प्रारंभिक प्रकाशन विभिन्न नगरों से, वर्तमान में प्रयागराज

13

अग्रहरि मिलाप

1967

त्रैमासिक

बाबू लक्ष्मण प्रसाद

जबलपुर

14

अग्रहरि संदेश

अप्रैल 1967

त्रैमासिक

श्रीमती सावित्री देवी राजकुमार गुप्ता अग्रहरि

बख्तियारपुर, पटना

15

अग्रहरि वाणी

मई 1992

मासिक

इंजीनियर गणेश जी

जबलपुर

16

अग्रहरि संदेश

2004

मासिक

श्री देवेंद्र कुमार

परतवाड़ा, अमरावती, महाराष्ट्र

17

संस्कार सौरभ

2005

जानकारी उपलब्ध नहीं

स्व. प्रेम प्रकाश शास्त्री

जबलपुर

18

संस्कार समुच्चय

2006

मासिक

श्री किशन नारायण

जबलपुर

19

अग्रहरि परिवार

2009

मासिक

श्री नंदलाल एवं श्री राधेश्याम (स्वामित्व: श्री सोमचंद)

कानपुर