अग्रहरी समाज के गौरव IAS सचिन कुमार वैश्य और उनका जीवन परिचय

IAS Sachin Kumar Vaishya

किसी भी समाज की पहचान उसके संस्कारों और उसकी भावी पीढ़ी की उपलब्धियों से होती है। हमारे अग्रहरी समाज के लिए यह अत्यंत गर्व का विषय है कि समाज के एक होनहार रत्न,
 श्री सचिन कुमार वैश्य जी (IAS Sachin Kumar Vaishy) ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में चयनित होकर न केवल अपने परिवार, बल्कि संपूर्ण समाज का नाम देश के सर्वोच्च स्तर पर रोशन किया है।

उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र का जनपद प्रतापगढ़ की मिट्टी ने देश को कई होनहार अफसर दिए हैं, लेकिन जब कोई युवा बेहद साधारण परिवेश से निकलकर अपनी मेधा और परिश्रम के दम पर देश की सबसे कठिन परीक्षा को पहले ही प्रयास में पास कर ले, तो वह न केवल अपने परिवार का, बल्कि पूरे समाज का गौरव बन जाता है। हम बात कर रहे हैं 2015 बैच के तेजतर्रार आईएएस अधिकारी श्री सचिन कुमार वैश्य की, जो वर्तमान में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (SMVDSB) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के पद पर आसीन हैं।
जड़ें और पारिवारिक पृष्ठभूमि, संघर्ष से सफलता तक
सचिन कुमार वैश्य का जन्म 18 जुलाई 1992 को, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के लालगंज इलाके के छोटे से गांव सांगीपुर में हुआ। उनका परिवार बेहद साधारण है, जो अपनी जड़ों से गहराई तक जुड़ा हुआ है। पिता, श्री अनिल कुमार अग्रहरि, आज भी सांगीपुर बाजार में अपनी छोटी सी दुकान चलाते हैं। इलाके में एक सम्मानित व्यापारी के तौर पर उनकी पहचान है। वहीं, मां, श्रीमती अशोक कुमारी, ने घर-परिवार संभालते हुए अपने बच्चों में ईमानदारी और संस्कारों की मजबूत नींव रखी।
दिलचस्प बात यह है कि सचिन की इस बड़ी सफलता की कहानी में उनके पिता का भी एक सपना छिपा है। स्थानीय लोग बताते हैं कि युवा अनिल जी ने भी कभी पुलिस की वर्दी पहनने का ख्वाब देखा था। उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस में भर्ती होने के लिए खूब मेहनत की, परीक्षा भी दी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, वे पुलिस में शामिल नहीं हो सके। इसी कारण, आज भी क्षेत्र में लोग उन्हें प्यार और सम्मान से 'दरोगा जी' कहकर बुलाते हैं।
भले ही पिता के मन में पुलिस में भर्ती न हो पाने की एक हल्की सी कसक रह गई हो, लेकिन उनके बेटे सचिन ने सीधे IAS अधिकारी बनकर, उस अधूरे सपने को न सिर्फ पूरा किया, बल्कि उसे एक नई बुलंदी दे दी।
अग्रहरी (वैश्य) समाज से आने वाले सचिन जी ने बचपन से ही अपने पिता को कड़ी मेहनत करते देखा। एक व्यापारी परिवार में पले-बढ़े होने के नाते, उन्होंने धैर्य और परिश्रम का महत्व बहुत कम उम्र में ही समझ लिया था। उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि माता-पिता का आशीर्वाद और बच्चों की लगन सच्ची हो, तो संसाधनों की कमी कभी आड़े नहीं आती।
शिक्षा और सिविल सेवा का सफर
सचिन कुमार वैश्य की शैक्षणिक यात्रा किसी भी युवा के लिए प्रेरणास्त्रोत है। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग (B.Tech) में स्नातक की डिग्री हासिल की है और पब्लिक मैनेजमेंट में मास्टर्स (M.A.) भी किया है।
इंजीनियरिंग के दौरान ही उन्होंने देश सेवा का मन बना लिया था। उनकी तैयारी इतनी सटीक और संकल्प इतना दृढ़ था कि वर्ष 2015 की यूपीएससी (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा में उन्होंने मात्र 22 वर्ष की आयु में, अपने पहले ही प्रयास में 94वीं रैंक हासिल कर ली। इतनी कम उम्र में आईएएस बनकर उन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती।
प्रशासनिक कौशल और कार्यशैली
एजीएमयूटी (AGMUT) कैडर के अधिकारी के रूप में सचिन जी ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी हैं।

लेह-लद्दाख: कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया सहमी हुई थी, तब लेह के उपायुक्त (DC) के रूप में सचिन जी ने अद्भुत नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने सुदूर इलाकों तक राशन और दवाइयां पहुंचाईं, जिसकी प्रशंसा स्थानीय जनता आज भी करती है।

जम्मू और उधमपुर: जम्मू और उधमपुर के जिला उपायुक्त (DC) रहते हुए उन्होंने जन-शिकायतों के निवारण के लिए 'जनता दरबार' जैसे प्रयोग किए और प्रशासन को आम आदमी के दरवाजे तक पहुंचाया।

वर्तमान दायित्व : उनकी ईमानदारी और कार्यकुशलता को देखते हुए, अगस्त 2025 में उन्हें श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (Shri Mata Vaishno Devi Shrine Board) का सीईओ नियुक्त किया गया। 

एक अधिकारी के तौर पर आईएएस सचिन कुमार वैश्य जी की पूरा कार्य विवरण 

क्र.सं.पद / स्तरमंत्रालय / विभाग / कार्यालय / स्थानसंगठनअनुभव (मुख्य / गौण)कार्यकाल (से – तक)
1मुख्य कार्यकारी अधिकारी (उप सचिव समकक्ष)माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड, जम्मूकैडर (AIS)लोक प्रशासन / लोक प्रशासन08/08/2025 – वर्तमान तक
2उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, जम्मूकैडर (AIS)भूमि राजस्व प्रबंधन एवं जिला प्रशासन / भूमि अधिग्रहण21/08/2023 – 08/08/2025
3उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, उधमपुरकैडर (AIS)भूमि राजस्व प्रबंधन एवं जिला प्रशासन / जिला प्रशासन01/05/2023 – 21/08/2023
4उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, शोपियांकैडर (AIS)भूमि राजस्व प्रबंधन एवं जिला प्रशासन / जिला प्रशासन18/02/2021 – 30/04/2023
5उपायुक्त एवं जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, लेह (लद्दाख)कैडर (AIS)भूमि राजस्व प्रबंधन एवं जिला प्रशासन / जिला प्रशासन02/08/2019 – 17/07/2021
6अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (सीनियर टाइम स्केल)कलेक्टरेट, लेह (लद्दाख)कैडर (AIS)कानून एवं व्यवस्था / अपराध20/02/2019 – 02/08/2019
7उप कलेक्टर / एस.डी.एम. (जूनियर स्केल)उपमंडल, खाल्त्से (लेह)कैडर (AIS)कानून एवं व्यवस्था / अपराध31/10/2017 – 19/02/2019
8उपलब्ध नहींकैडर (AIS)30/09/2017 – वर्तमान तक
9सहायक सचिव (जूनियर स्केल)पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, केंद्रजल संसाधनजल संसाधन / पेयजल03/07/2017 – 29/09/2017
10प्रशिक्षणाधीन (जूनियर स्केल)कैडर (AIS)लागू नहीं / उपलब्ध नहीं07/09/2015 – 29/09/2017


सचिन वैश्य जी को वर्ष 2023 में जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा लोक प्रशासन के क्षेत्र में उत्कृष्ट सार्वजनिक सेवा हेतु राज्य स्तरीय “मेरिटोरियस पब्लिक सर्विस अवॉर्ड” से नवाज़ा गया।

सचिन जी अपनी जड़ों को कभी नहीं भूले। उन्होंने सरकारी दस्तावेजों में अपने नाम को "सचिन कुमार वैश्य" के रूप में दर्ज कराकर अपनी सामाजिक पहचान को गर्व के साथ स्थापित किया है।
 
आज अग्रहरी समाज को अपने इस लाल पर गर्व है। सचिन कुमार वैश्य जी हमारे समाज के हजारों युवाओं के लिए एक चलती-फिरती प्रेरणा हैं। हम, हमारा अग्रहरी समाज, IAS सचिन की उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। ईश्वर उन्हें और अधिक शक्ति दे ताकि वे इसी तरह समाज और राष्ट्र की सेवा करते रहें।

अग्रहरि गौरव: फतेहपुर में भाजपा का कमल खिलाने वाले अग्रहरि नेता पूर्व मंत्री बाबू राधेश्याम गुप्ता


फतेहपुर की राजनीति की बात होती है तो कुछ नाम अपने आप सामने आ जाते हैं। उन्हीं में एक नाम है राधेश्याम गुप्ता। वे उन नेताओं में से हैं जिन्होंने राजनीति को केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि संगठन, कार्यकर्ताओं और जनता के साथ लगातार जुड़ाव बनाए रखा। जिस दौर में उत्तर प्रदेश की राजनीति अस्थिरता और बदलाव से गुजर रही थी, उस समय फतेहपुर में भाजपा को मजबूती देने वालों में उनका योगदान अहम रहा।

राधेश्याम गुप्ता का जन्म 5 मार्च 1935 को फतेहपुर जनपद में हुआ। उनके माता-पिता सादा जीवन जीने वाले, अनुशासन और मेहनत में विश्वास रखने वाले लोग थे। घर का माहौल ऐसा था जहाँ जिम्मेदारी और समाज के प्रति सोच स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और शुरुआती वर्षों में व्यवसाय से जुड़े। यही व्यावसायिक अनुभव आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन में काम आया, लोगों को समझना, निर्णय लेना और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना।

1990 का दशक देश और प्रदेश दोनों के लिए बड़ा बदलाव लेकर आया। कांग्रेस का दबदबा कमजोर हो रहा था और राजनीति में वैचारिक साफ़गोई की मांग बढ़ रही थी। इसी समय भाजपा और संघ से जुड़ा संगठनात्मक काम तेज़ हुआ। फतेहपुर में भी राजनीति किसी एक दिशा में नहीं थी। ऐसे माहौल में राधेश्याम गुप्ता भाजपा के उन नेताओं में उभरे जो जमीन से जुड़े थे, कार्यकर्ताओं के बीच रहते थे और संगठन की बात समझते थे। पार्टी में उन्हें एक भरोसेमंद व्यक्ति माना जाने लगा। उस समय के बड़े नेता, खासकर अटल बिहारी वाजपेयी, उन्हें गंभीरता से लेते थे। वें अटल बिहारी वाजपेयी के काफी करीबी माने जाते थें। 

1991 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। वे संगठन के काम में और ज़्यादा सक्रिय हुए। 1993 का चुनाव फतेहपुर के लिए यादगार साबित हुआ। बाबरी विध्वंस के बाद देशभर में रामलहर साफ़ दिखाई दे रही थी। भाजपा ने उन्हें फतेहपुर सदर से उम्मीदवार बनाया। उस चुनाव में एक दिलचस्प दृश्य था, एक तरफ भाजपा के लिए अटल बिहारी वाजपेयी की सभा और दूसरी तरफ कांग्रेस के समर्थन में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की रैली। अटल जी की सभा ने माहौल बदल दिया और राधेश्याम गुप्ता पहली बार विधायक बने। उसी चुनाव के साथ फतेहपुर में भाजपा का कमल पहली बार खिला।

इसके बाद 1996 में उन्होंने दोबारा जीत हासिल की। जनता का भरोसा उनके साथ था। 2002 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 2007 में वे फिर से विधानसभा पहुँचे। यह बताता है कि वे केवल किसी एक लहर के नेता नहीं थे। उनकी प्रशासनिक समझ को देखते हुए उन्हें कल्याण सिंह सरकार में संस्थागत वित्त मंत्री बनाया गया। बाद में राजनाथ सिंह सरकार के समय उन्होंने कानून और न्याय से जुड़े दायित्व भी संभाले। ये जिम्मेदारियाँ उनके अनुभव और संतुलन का प्रमाण थीं।

वे ज़्यादा बोलने से ज़्यादा काम करने में विश्वास रखते थे। संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को साथ रखना और क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान देना, यही उनकी शैली रही। सामाजिक स्तर पर भी वे जुड़े रहे और अपने समुदाय सहित आसपास के लोगों से निरंतर संवाद बनाए रखा। उन्होंने यह दिखाया कि राजनीति में रहते हुए समाज से दूरी बनाना ज़रूरी नहीं है।

आज उनकी राजनीतिक यात्रा को उनके पुत्र विकास गुप्ता आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्होंने लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर जनता का भरोसा कायम रखा है। यह भरोसा केवल एक नाम का नहीं, बल्कि उस काम और व्यवहार का परिणाम है जो वर्षों से लोगों ने देखा है।

फतेहपुर की राजनीति में भाजपा की जो जगह आज दिखती है, उसकी नींव रखने वालों में राधेश्याम गुप्ता का नाम हमेशा लिया जाएगा। वे आज भी एक ऐसे नेता के रूप में याद किए जाते हैं जिन्होंने कठिन समय में संगठन का साथ दिया और क्षेत्र को एक स्पष्ट राजनीतिक दिशा देने में भूमिका निभाई।

अग्रकुल भूषण: श्यामा चरण गुप्ता – राजनीति के शिखर और व्यापार के 'किंग' का प्रेरणादायक सफर

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी एवं पूर्व सांसद स्वर्गीय श्री श्यामाचरण गुप्ता 

अग्रहरि समाज के गौरव और भारत की राजनीति एवं व्यापार जगत के एक प्रतिष्ठित स्तंभ,श्यामा चरण गुप्ता (Shyama Charan Gupta) (9 फरवरी 1945 – 9 अप्रैल 2021) का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। प्रयागराज (इलाहाबाद) की धरती से निकलकर देश की संसद तक का सफर तय करने वाले श्यामा चरण जी ने यह सिद्ध किया कि यदि इच्छाशक्ति प्रबल हो, तो एक साधारण व्यवसायी भी समाज और राष्ट्र निर्माण में असाधारण भूमिका निभा सकता है।

स्वर्गीय श्यामा चरण गुप्ता अग्रहरि समाज के उन विशिष्ट व्यक्तित्वों में से थे, जिनका जीवन साधारण परिस्थितियों से आरंभ होकर असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचा। वे एक सफल उद्यमी, कुशल राजनेता और समाज के प्रति गहन उत्तरदायित्व निभाने वाले युगद्रष्टा व्यक्ति थे। व्यापार और राजनीति, दोनों क्षेत्रों में उन्होंने अपने परिश्रम, सूझबूझ और जुझारूपन से स्थायी पहचान बनाई।

श्यामा चरण गुप्ता का जन्म 9 फरवरी 1945 को उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जनपद के मानिकपुर ब्लॉक अंतर्गत ऊँचडीह ग्राम में एक अग्रहरि वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता स्व. तीरथ प्रसाद गुप्त सादगी और श्रमशील जीवन के प्रतीक थे। अत्यंत पिछड़े और संसाधनविहीन क्षेत्र में जन्म लेने के बावजूद श्यामा चरण गुप्ता ने बचपन से ही अपनी मिट्टी, जंगल और परिवेश को बहुत निकट से देखा। गाँव के आसपास के जंगलों में तेंदू पत्ते की प्रचुर उपलब्धता ने उनके मन में आगे चलकर उद्यम की नींव रखी।

युवावस्था में उन्होंने मानिकपुर क्षेत्र से तेंदू पत्ते के माध्यम से बीड़ी निर्माण का कार्य छोटे स्तर पर प्रारंभ किया। पाठा क्षेत्र के जंगलों में तेंदू पत्ते का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। इसी संसाधन को आधार बनाकर उन्होंने अपने व्यवसाय को क्रमशः उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश तक विस्तारित किया। कुछ ही वर्षों में वे बीड़ी व्यापार के बड़े नामों में गिने जाने लगे।

सन 1973 में उन्होंने औपचारिक रूप से ‘श्याम ग्रुप (Shyama Group)’ की स्थापना की। समय के साथ यह समूह देश की जानी-मानी व्यावसायिक कंपनियों में शामिल हो गया।

श्याम ग्रुप के संस्थापक श्यामाचरण गुप्ता

प्रयागराज में स्थापित ‘होटल कान्हा श्याम’ उनके आधुनिक सोच और गुणवत्ता-केंद्रित दृष्टिकोण का प्रतीक बना। इसके साथ ही उन्होंने श्याम डेयरी, लॉजिस्टिक्स, रियल एस्टेट और वेयरहाउसिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भी अपने व्यापार का विस्तार किया। इस प्रकार श्यामा चरण गुप्ता ने सीमित संसाधनों से आरंभ कर एक सुदृढ़ और विविधतापूर्ण व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा किया, जो उनकी उद्यमशीलता और अथक परिश्रम का प्रत्यक्ष प्रमाण है। बीड़ी उद्योग में उनके व्यापक प्रभाव और नेतृत्व के कारण उन्हें ‘बीड़ी किंग’ की उपाधि से संबोधित किया जाने लगा। वे श्याम ग्रुप ऑफ कंपनीज के संस्थापक एवं चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) रहे। व्यवसाय में बुलंदियों को छूते हुए भी वे अपनी जड़ों और समाज से सदैव जुड़े रहे।

राजनीति में उनका प्रवेश एक विशुद्ध व्यवसायी के रूप में सामाजिक सरोकारों के चलते हुआ। सन 1984 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उनका राजनीतिक जीवन प्रारंभ में स्वर्गीय संजय गांधी की पत्नी  मेनका गांधी की पार्टी ‘संजय विचार मंच’ से शुरू हुआ, जहाँ से उन्हें तत्कालीन कर्वी विधानसभा सीट (बांदा जिला) से चुनाव लड़ने का अवसर मिला। यद्यपि पहले प्रयास में उन्हें पराजय मिली, किंतु उन्होंने राजनीति से पीछे हटने के बजाय अपने संघर्ष को और सशक्त बनाया।

इसके पश्चात उन्होंने इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया। सन 1989 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए नगर निगम इलाहाबाद के मेयर का पद प्राप्त किया और 1993 तक इस दायित्व का निर्वहन किया। इस दौरान उन्होंने नगर के प्रशासन, व्यापारिक वातावरण और नागरिक सुविधाओं को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सन 1991 में उन्होंने भाजपा के कमल निशान पर इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा, किंतु सफलता नहीं मिली। सन 1995 में श्यामा चरण गुप्ता ने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर अपनी पत्नी श्रीमती जमुनोत्री गुप्ता को नगर निगम इलाहाबाद के मेयर पद का चुनाव लड़वाया। इसके पश्चात श्यामा चरण गुप्ता स्वयं भी भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव में उतरे, हालांकि यहाँ भी उन्हें विजय नहीं मिल सकी। इन अनुभवों ने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को और अधिक परिपक्व किया तथा संगठन, जनसंपर्क और चुनावी यथार्थ की गहरी समझ प्रदान की।



लोकसभा टिकट और संगठनात्मक मतभेदों को लेकर आगे चलकर उनके भाजपा नेतृत्व से मनमुटाव हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। समाजवादी पार्टी में उन्हें संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ मिलीं और उनकी जमीनी पकड़ को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय सचिव भी मनोनीत किया गया। इस भूमिका में उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए, जो उस समय व्यापक चर्चा में रहे।

सन 2004 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांदा–चित्रकूट लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और विजयी होकर पहली बार भारत की संसद पहुँचे। यह केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि अग्रहरि समाज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था, जब समाज का एक प्रतिनिधि विश्व के सबसे बड़े गणतांत्रिक राष्ट्र के सर्वोच्च विधायी सदन तक पहुँचा। यह सफलता उनके वर्षों के राजनीतिक संघर्ष, संगठनात्मक क्षमता और जनविश्वास का प्रतिफल थी, जिसने अग्रहरि समाज को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान और गौरव प्रदान किया। 

इसके पश्चात सन 2009 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें फूलपुर (इलाहाबाद) लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया, किंतु इस चुनाव में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

राजनीतिक जीवन के उतार-चढ़ावों के बीच उन्होंने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी में वापसी की। सन 2014 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी रेवती रमन सिंह को पराजित कर भारी मतों से सांसद निर्वाचित हुए। यह विजय उनके राजनीतिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।

सांसद श्यामचरण गुप्ता जी एक राजनैतिक कार्यक्रम के दौरान 

सन 2019 में उन्होंने पुनः समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांदा से लोकसभा चुनाव लड़ा, किंतु इस बार उन्हें सफलता नहीं मिली। इस प्रकार उनका राजनीतिक जीवन निरंतर संघर्ष, परिवर्तन और सार्वजनिक स्वीकार्यता का सजीव उदाहरण बना रहा।

श्यामा चरण गुप्ता अग्रहरि वैश्य समुदाय से थे और समाज के प्रति उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा। वे सामाजिक कार्यों में सदैव सक्रिय रहे और अपनी सामर्थ्य के अनुसार समाज के कमजोर वर्गों की सहायता करते रहे। श्यामा चरण गुप्ता जी अपनी अग्रहरि वैश्य पहचान को लेकर सदैव गर्व का अनुभव करते थे और इसे उन्होंने केवल व्यक्तिगत गौरव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना से जोड़ा। वे अखिल भारतीय अग्रहरि वैश्य समाज के मार्गदर्शक स्वरूप माने जाते थे और किसी भी अग्रहरि बंधु को सहायता की आवश्यकता होने पर वे आगे बढ़कर सहयोग करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। अपने सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन के माध्यम से उन्होंने यह प्रमाणित किया कि अग्रहरि समाज केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्र के नेतृत्व की पूर्ण क्षमता रखता है। वे अग्रहरि समाज के लिए एक बरगद के पेड़ के समान थे। 

सन 2014 में मुंबई में आयोजित अखिल भारतीय अग्रहरि समाज के शताब्दी समारोह में श्यामा चरण गुप्ता जी की उपस्थिति समाज के लिए विशेष महत्व रखती थी। इस अवसर पर उन्होंने अग्रहरि समाज के लोगों से एक दूरदर्शी और प्रेरणादायी आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाज का विकास तभी संभव है, जब उसकी सक्रिय भागीदारी राजनीति में भी हो। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह कोई मायने नहीं रखता कि कोई व्यक्ति किस राजनीतिक दल से जुड़ता है या किस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ता है; महत्वपूर्ण यह है कि अग्रहरि समाज के लोग आगे आएँ, चुनाव लड़ें और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहभागी बनें। उनके अनुसार, राजनीति में समाज की बढ़ती सहभागिता ही अग्रहरि समाज को संगठित शक्ति प्रदान करेगी और उसे विकास तथा राष्ट्रीय नेतृत्व की दिशा में अग्रसर करेगी।


श्यामा चरण गुप्ता जी का विवाह 4 फरवरी 1967 को श्रीमती जमुनोत्री देवी गुप्ता के साथ हुआ। उनका पारिवारिक जीवन सादगी, संस्कार और आपसी सम्मान पर आधारित था। उनके दो पुत्र, विदुप अग्रहरि और विभव अग्रहरि, तथा एक पुत्री वेणु अग्रहरि (डिंगरा) हैं।

उनके पुत्र विदुप अग्रहरि अपने पिता की भाँति व्यवसाय के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय हैं, जबकि विभव अग्रहरि मुख्य रूप से व्यवसायिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। उनकी पुत्री वेणु अग्रहरि (ढींगरा) एक जानी-मानी समाजसेविका हैं और उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती जमुनोत्री देवी गुप्ता भी विभिन्न सामाजिक कार्यों में सक्रिय सहभागिता निभाती रही हैं।

कोरोना महामारी के दौरान श्याम चरण जी संक्रमित हो गए थे और उपचार चल रहा था। अप्रैल 2021 में उनके निधन का समाचार मिलते ही चित्रकूट, बांदा और प्रयागराज क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। ऊँचडीह जैसे छोटे से गाँव से निकलकर संसद तक पहुँचने वाले इस व्यक्तित्व का जाना देश और समाज के लिए एक गहरी क्षति थी।

अग्रहरि समाज अपने इस लाल पर सदैव गर्व करता रहेगा और उन्हें एक उद्यमशील, संघर्षशील तथा प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व के रूप में स्मरण करता रहेगा।

“कुछ लोग जीते नहीं, मिसाल बन जाते हैं,
कुछ नाम मिट जाते हैं, कुछ इतिहास बन जाते हैं।”

जानिए, अग्रहरि समाज के शादी-विवाह के रीति-रिवाज


भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और उनकी सदियों पुरानी परंपराओं का संगम है। अग्रहरि वैश्य समुदाय, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ, विवाह के हर चरण में गहन अर्थ और ज्ञान को समेटे हुए है। आइए, इन पारंपरिक संस्कारों की गहराई को समझते हैं।


1. बीरा: दृढ़ संकल्प का प्रतीक अग्रहरि समाज में 'बीरा' (पान का बीड़ा) संबंध पक्का करने का एक प्राचीन द्योतक है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि किसी कार्य को दृढ़ निश्चय के साथ करने की भारतीय परंपरा का प्रतिबिंब है। पान का बीड़ा, अक्षत (चावल), एक रुपया, हल्दी और सुपारी का इसमें विशेष महत्व है। यह दर्शाता है कि संबंध केवल आज के लिए नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प के साथ भविष्य के लिए स्थापित किया जा रहा है। हालांकि, आधुनिकता के साथ इसमें लौकिक प्रदर्शन का तत्व भी जुड़ गया है, पर इसका मूल अर्थ आज भी अडिग है।

2. लग्न: शुभ मुहूर्त का विधान 'लग्न' का शाब्दिक अर्थ है मुहूर्त, यानी एक शुभ समय। कन्या पक्ष द्वारा विवाह का शुभ मुहूर्त निकलवाकर वर पक्ष को भेजा जाता है। यह केवल पंचांग देखकर समय तय करना नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि शुभ मुहूर्त में किया गया कार्य सफलता और खुशहाली लाता है। यह परंपरा दोनों परिवारों के लिए नए जीवन की शुरुआत को एक सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ने का प्रयास है।

3. खन माटी, मंडपाच्छादन एवं हरिद्रालेपन:

खन माटी: प्रकृति पूजन का आरंभ वैवाहिक कार्यक्रमों का आरंभ 'खन माटी' से होता है, जिसके पीछे मिट्टी का पूजन की गहरी भावना निहित है। यह रस्म हमें अपनी जड़ों, प्रकृति और जीवन को चलाने वाले प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान सिखाती है। मूसल, चक्की, दराती, चूल्हा, मथानी जैसी वस्तुओं का पूजन यह दर्शाता है कि जीवन में साधारण वस्तुओं का भी कितना महत्व है।

मंडपाच्छादन: सामर्थ्य और परंपरा का मेल यह रस्म राजा-महाराजाओं के बड़े-बड़े मंडप बनाने की प्राचीन परंपरा का अनुसरण है। आज भी, अपने सामर्थ्य के अनुसार, एक लकड़ी का खंभा गाड़कर मंडप की नींव रखी जाती है। यह दिखाता है कि भव्यता के बजाय भावना और परंपरा का पालन अधिक महत्वपूर्ण है।

हरिद्रालेपन (हल्दी लगाना): सौंदर्य और स्वास्थ्य का विज्ञान हल्दी का लेप केवल एक रस्म नहीं, बल्कि प्राचीन स्वास्थ्य विज्ञान का हिस्सा है। हल्दी शरीर को शुद्ध करती है, त्वचा को निखारती है, रक्त संचार को बेहतर बनाती है और शरीर को स्फूर्ति प्रदान करती है। विवाह संस्कार का मूल उद्देश्य दो जीवनसाथियों का शारीरिक मिलन है, और हरिद्रालेपन शारीरिक सौंदर्य व स्वास्थ्य को बढ़ाता है, जो इस उद्देश्य में सहायक होता है। हालांकि, कुछ स्थानों पर इस प्रथा का विकृत रूप देखा जाता है, जहाँ स्वच्छता का ध्यान नहीं रखा जाता, जिससे इस वैज्ञानिक और लाभकारी प्रथा का मूल उद्देश्य ही खो जाता है।

4. मोर-मोरी: मुकुट का प्रतीकात्मक रूप विवाह संस्कार में मोर-मोरी (सिर पर पहनने वाला आभूषण) का अत्यधिक महत्व है। यह राजाओं के मुकुटों का ही एक प्रतीकात्मक रूपांतरण है। यह दर्शाता है कि हर वर-वधू अपने विवाह के दिन अपने-अपने संसार के राजा-रानी होते हैं, और सामर्थ्य के अनुसार ही इस शाही प्रतीक को अपनाया जाता है।

5. मायन: पितरों का आशीर्वाद 'मायन' में पितरों और देवताओं की पूजा की जाती है। यह रस्म परिवार के सभी सदस्यों को एकजुट करती है, और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करने का एक तरीका है। यह हमें अपनी वंशावली और उन लोगों के प्रति कृतज्ञता सिखाती है जिन्होंने हमारे जीवन की नींव रखी है।

6. द्वारचार: आदर और खुशी का आदान-प्रदान जब बारात कन्या पक्ष के द्वार पर आती है, तब 'द्वारचार' की रस्म होती है, जिसका अर्थ है द्वार पर स्वागत। चावल और बताशे छिड़कने का रिवाज शुभ संकेत और प्रसन्नता का प्रतीक है। कन्या पक्ष चावल छिड़क कर शुभता का आह्वान करता है, और वर पक्ष बताशे फेंक कर धन्यवाद व अपनी खुशी व्यक्त करता है। कलश और अन्य मांगलिक वस्तुएं शुभता का द्योतक होती हैं।

7. पाणिग्रहण: जीवन भर की प्रतिज्ञा मंगलोपचार के बाद 'पाणिग्रहण' संस्कार होता है। संस्कृत में 'पाणिग्रहण' का अर्थ है हाथ ग्रहण करना – वर वधू का हाथ अपने हाथ में लेता है। यह जीवनभर एक-दूसरे का सहयोग करने और गृहस्थी को साथ मिलकर चलाने की प्रतिज्ञा है। यह केवल शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि आत्मिक और वैचारिक जुड़ाव का प्रतीक है।

8. पैर पूजना: श्रद्धा और पवित्रता का भाव वर और कन्या के पैर कन्या पक्ष की ओर से पूजे जाते हैं। इस रस्म में श्रद्धा और पवित्रता की गहरी भावना निहित है। यह नए रिश्तों के प्रति आदर और सम्मान व्यक्त करने का तरीका है, जो दोनों परिवारों के बीच सामंजस्य स्थापित करता है।

9. खिचड़ी: एकजुटता का स्वाद और स्वस्थ भोजन का संदेश विवाह के दूसरे दिन 'खिचड़ी' की रस्म होती है, हालांकि अब यह धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। मूल रूप से, यह संध्याकालीन प्रीतिभोज की तैयारी थी और गरिष्ठ भोजन के बाद हल्का व सुपाच्य भोजन लेने का स्वस्थ संदेश भी देती थी। कुछ लोगों का मानना है कि दाल और चावल क्रमशः वर और कन्या पक्ष का प्रतीक हैं, जैसे वे मिलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही दोनों परिवार भी एक हो जाएं। हालांकि, कई बार नेग को लेकर होने वाली खींचतान इस सुंदर भावना को धूमिल कर देती है।

विवाह का उत्सव: हास्य और उल्लास
10. अन्य वैवाहिक रश्म एवं रिवाज़: इन प्रमुख संस्कारों के अतिरिक्त, अग्रहरि विवाह में मिलनी, परछन, गाली-गवाई, जूता-चुराई, बाती मिलाई जैसे अनेक कार्यक्रम भी होते हैं। ये रस्में विवाह के गंभीर माहौल में हास्य, उल्लास और मनोरंजन का संचार करती हैं, इसे एक यादगार उत्सव बनाती हैं।

अग्रहरि वैश्य समाज का परिचय: उत्पत्ति, विकास और आज की सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति

 


भारतीय समाज में वैश्य समुदाय, अपने व्यापारिक कौशल और आर्थिक योगदान के लिए जाना जाता है। इस विशाल समुदाय के भीतर कई उपजातियाँ हैं, जिनमें 'अग्रहरि' वैश्य जाति एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह ब्लॉग पोस्ट अग्रहरि समुदाय के ऐतिहासिक सफर, उनकी विशिष्ट पहचान और वर्तमान में उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रगति पर प्रकाश डालता है।

अग्रहरि जाति की उत्पत्ति और ऐतिहासिक जड़ें

अंग्रेजी लेखकों के अनुसार, सन् 1911 में अग्रहरि वैश्य जाति की अनुमानित संख्या लगभग दो हज़ार थी। ये मुख्य रूप से जबलपुर, रायपुर, बिलासपुर और तत्कालीन रियासतों में बसे हुए थे। अग्रहरि वैश्य स्वयं को मूलतः वैश्य जाति से संबंधित मानते हैं और ब्राह्मणों की तरह यज्ञोपवीत धारण करते हैं। अग्रवाल वैश्यों के समान ही, ये भी स्वयं को ऐतिहासिक नगरों आगरा और अग्रोहा से जुड़ा हुआ मानते हैं, जो इनके अग्रवालों से घनिष्ठ संबंधों को दर्शाता है।

श्री नेसफील्ड ने अपनी पुस्तक 'Tribes and Castes' (Mr. Crooks) में उल्लेख किया है कि अग्रवाल और अग्रहरि दोनों जातियाँ कभी एक ही वंश की शाखाएँ थीं। उनके मतभेद का कारण "किसी मामूली खाने-पीने की बात पर आपस में विवाद" होना बताया गया है, जिसके परिणामस्वरूप वे अलग हो गईं।

'अग्रवाल जाति के प्राचीन इतिहास' में भी यह जानकारी मिलती है कि मध्यप्रांत और बनारस में 'अग्रहरि' नामक एक देशज जाति मौजूद थी, जिसे अब अग्रवालों से पृथक माना जाता है। हालांकि, ये लोग भी अपने मूल निवास स्थान के रूप में अग्रोहा और आगरा का ही उल्लेख करते हैं। श्री नेसफील्ड और श्री रसेल ने अनुमान लगाया कि इन अग्रहरि वैश्यों का अग्रवालों से गहरा संबंध रहा है, लेकिन किसी समय हुए मतभेद के कारण अग्रहरियों की एक पृथक बिरादरी का गठन हो गया।

प्रसिद्ध इतिहासकार सत्यकेतु विद्यालंकार अपनी पुस्तक "अग्रवाल जाति का प्राचीन इतिहास" (पृष्ठ 264) में इस अलगाव को और स्पष्ट करते हुए लिखते हैं:

"यह जाति अग्रवंश की ही एक शाखा है। किसी तुच्छ बात पर आपसी विवाद के कारण इन्होंने अग्रवालों से स्वयं को पृथक कर लिया। अग्रवाल नाम से एक दल विख्यात रहा, जबकि दूसरा दल, जिसकी संख्या कम थी, भिन्न आहार के कारण 'अलगाहारी' कहलाया। कालांतर में यही नाम 'अग्राहारी''अग्रहरि' में परिवर्तित हो गया।"

एक अन्य प्रचलित मत के अनुसार, इस जाति के पूर्वज अग्रवाल थे जो अग्रोहा में रहते थे। अग्रोहा के नष्ट हो जाने के बाद, वे अन्य नगरों में बस गए। इन नगरों के स्थानीय लोग उन्हें 'अग्रहा हारे' (आगरा से हारे हुए) कहने लगे, और यही शब्द धीरे-धीरे 'अग्रहरि' में बदल गया। सन् 1894 ई. तक, यह जाति अग्रवालों से स्पष्ट रूप से अलग मानी जाने लगी। अग्रहरि जाति भी अग्रवालों की भांति खान-पान में शुद्धता और यज्ञोपवीत धारण करने की परंपरा का पालन करती है।

जनगणना आयुक्त ने भी अग्रहरियों और अग्रवालों के बीच के संबंध को स्वीकार करते हुए लिखा है:

"It may supply an explanation of the divergence of the Agrahari from the Agrawalas. There is no doubt that they are closely connected with the Agrawalas." (C&T, p. 133-134)

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी कृति 'जययौद्धेय' की भूमिका में इन संबंधों को और व्यापक संदर्भ में समझाते हुए लिखा है:

"अग्रवाल, अग्रहरि, रोहतगी, रस्तोगी, श्रीमाल, ओसवाल, वर्णवाल आदि वैश्य जातियाँ यौद्धेयों की संतान हैं, जो गणेच्छेद के बाद तलवार छोड़ तराज़ू उठाने को मजबूर हुईं।"



इन ऐतिहासिक संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि अग्रहरि, अग्रवालों की ही एक उपशाखा है, जिसने समय, क्षेत्र, रीति-रिवाज और विचारों की भिन्नता के कारण अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना ली है।

आजीविका, भौगोलिक फैलाव और आधुनिक प्रगति

अग्रहरि समुदाय की आजीविका पारंपरिक रूप से दुकानदारी (मिठाई, किराना), कृषि व्यापार और नौकरी पर आधारित रही है। यह जाति उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि में फैली हुई है।

मुंबई, महाराष्ट्र में हमारे समाज के लोग मुख्यतः सब्जी बेचने के व्यवसाय में सक्रिय हैं। साथ ही, तमाम युवा बड़ी कंपनियों में नौकरी कर अपनी तरक्की कर रहे हैं, और नई पीढ़ी शिक्षा हासिल कर उद्यमिता (entrepreneurship) की ओर भी बढ़ रही है। यह देखकर खुशी होती है कि बहुत से लोग सरकारी नौकरियों जैसे आईएएस, आईपीएस, आईएफएस आदि में भी सफल होकर उच्च पदाधिकारी बन चुके हैं।

हालांकि, कई स्थानों पर 'अग्रहरि' नाम अभी भी अपरिचित है, और संदर्भ के लिए लोगों को अग्रवाल कहा जाता है। स्थानीय लोग अक्सर उन्हें उनके व्यवसाय के आधार पर 'महाजन', 'बनिया', 'सेठ', 'हलवाई' आदि नामों से पुकारते हैं।

आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति

आर्थिक स्थिति: अग्रहरि समाज परंपरागत रूप से सरल जीवनशैली अपनाता आया है। हमारे लोग, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं, जहां कई सदस्य ठेला, खोमचा, या छोटी दुकानें चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। हालांकि, मध्यमवर्गीय वर्ग भी तेजी से बढ़ रहा है, और कुछ परिवार संपन्नता की ओर बढ़ रहे हैं। यह स्पष्ट है कि अग्रहरि समाज मेहनत और लगन से अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है।

शैक्षणिक स्थिति: शैक्षणिक क्षेत्र में भी अग्रहरि समाज ने पिछले दशक में अभूतपूर्व प्रगति की है। जहां पहले ग्रामीण इलाकों में शिक्षा को उतना महत्व नहीं दिया जाता था, वहीं अब लड़के और लड़कियां समान रूप से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित हैं। खासकर शहरी क्षेत्रों में हमारे युवा शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर रहे हैं और नौकरी, सरकारी सेवा एवं उद्यमिता के क्षेत्र में सफल हो रहे हैं। यह बदलाव हमारे समाज की सकारात्मक सोच और प्रगति की सबसे बड़ी मिसाल है।

जनगणना के लिए जागरूकता

हमारी जाति अभी भी ओपन (सामान्य) श्रेणी में आती है, जबकि आर्थिक स्तर पर हम बहुत से अन्य समुदायों से पिछड़े हुए हैं। इसीलिए, यह समय की मांग है कि हम सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए ओबीसी (OBC) श्रेणी में आने की पहल करें। हमारे समाज के प्रतिनिधि इस दिशा में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी को बेहतर अवसर मिल सकें और वे समाज में अपनी भूमिका और भी मजबूती से निभा सकें।

अग्रहरि समाज की विशिष्ट पहचान को लेकर अभी भी लोगों में भ्रम पाया जाता है, क्योंकि हमारे समाज के लोग विभिन्न उपनाम जैसे गुप्ता, वैश्य, साव, महाजन, बनिया आदि उपयोग करते हैं। इससे न केवल हमारी असली संख्या का सही पता लगाना कठिन हो जाता है, बल्कि हमारी सामाजिक एकता पर भी असर पड़ता है।

इसलिए, हम सभी अग्रहरि समाज के सदस्यों से निवेदन करते हैं कि आगामी जनगणना में अपनी जाति का स्पष्ट और सही उल्लेख 'अग्रहरि वैश्य' के रूप में करें। ऐसा करने से न केवल हमारी असली जनसंख्या सामने आएगी बल्कि हमारे अधिकारों की लड़ाई और सामाजिक विकास के प्रयास और अधिक सशक्त होंगे।


अग्रहरि कौन हैं हम? अग्रहरि शब्द की व्युत्पत्ति का पूरा इतिहास


हमारे अग्रहरि समुदाय का नाम सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि हमारी सदियों पुरानी पहचान है। विभिन्न ग्रन्थों एवं विद्वानों ने 'अग्रहरि' शब्द की व्याख्या विभिन्न दृष्टिकोणों से की है। जिनके अध्ययन से अनेक तथ्य सामने आते हैं।

१. महाराजा अग्रसेन और अहिंसा की नींव

हम सभी को अपने परम श्रद्धेय पूर्वज महाराजा अग्रसेन पर असीम गर्व है। उन्होंने प्राचीन काल में अग्रोहा और आगरा जैसे समृद्ध नगरों की स्थापना की। अग्रोहा उनकी राजधानी थी, जहाँ से वे स्वयं शासन करते थे, जबकि आगरा में उनके अनुज 'शूरसेन' का राज था। इसी कारण यह क्षेत्र 'शौरसेन' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महाराजा अग्रसेन ने कुल 18 महायज्ञ संपन्न किए। इनमें से 17 यज्ञ निर्विघ्न और सफलतापूर्वक पूरे हुए।

लेकिन, 18वें यज्ञ में होने वाली पशुबलि ने महाराजा अग्रसेन के मन को अत्यधिक विचलित कर दिया। उन्हें लगा कि पशुवध एक महापाप है, और वे ऐसी हिंसा के पक्ष में नहीं थे। इसलिए, उन्होंने 18वें यज्ञ को अधूरा छोड़ दिया। उन्होंने तत्काल आदेश दिया, "मैं पशु हिंसा को उचित नहीं समझता, अतः मैं अपने भाई, पुत्रों, कन्याओं और कुटुम्बियों को तथा उपस्थित सत्रह वैश्य कुलों को यही उपदेश देता हूँ कि कोई भी हिंसा न करे।"

यह घटना 'अग्रोतकान्वय' (पृष्ठ ६१, ६२) में भी वर्णित है और यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि महाराजा अग्रसेन के समय में ही हमारे समाज में 17 विशिष्ट वैश्य कुल मौजूद थे, जिनकी अगुवाई वे स्वयं कर रहे थे।
२. हरिजी का प्रभाव और 'अग्रहरि' शब्द की उत्पत्ति

यह एक महत्वपूर्ण किंवदंती है कि 18वें यज्ञ की देखरेख कुबेर 'हरिजी' करने वाले थे। हरिजी भगवान विष्णु के भक्त थे और अहिंसा में उनकी गहरी आस्था थी। यह अत्यंत संभव है कि उन्हीं की गहन प्रेरणा और प्रोत्साहन से महाराजा अग्रसेन ने अहिंसा का मार्ग अपनाया और यज्ञ में पशुबलि को रोका। यह उनके वैश्य धर्म के अनुरूप भी था, क्योंकि कौटिल्य के अर्थशास्त्र (१/४) के अनुसार, वैश्य वर्ग का परम धर्म कृषि, पशुपालन और वाणिज्य ही है।

'उरु चरितम्' (७७-७८) में भी इसी भावना को व्यक्त किया गया है:

"वैश्यों का प्रधान कर्म मुख्यतः यह कहा गया है कि वे पशुओं का पालन तथा उनकी सब ओर से रक्षा करें। यज्ञ में पशुवध होता है, इसलिए मैं पाप का भागी हूँ। यह विचार प्रतिक्षण मेरे हृदय में दृढ़ होता जा रहा है।"

हरिजी ने हिंसा से जुड़े कार्यों में सहयोग नहीं दिया और उन्होंने स्वयं को अन्य अग्रवालों से अलग कर लिया। इस प्रकार, वे 'अलगाहारी' (अलग आहार करने वाले) बनकर अपना शुद्ध भोजन अलग से बनाने और ग्रहण करने लगे। समय के साथ, 'अलगाहारी' शब्द 'अल्गाहारी' में बदला, फिर 'अग्रहारि' में और अंततः हमारा वर्तमान नाम 'अग्रहरि' बन गया। इस परिवर्तन का उल्लेख 'गुप्त जाति का इतिहास' (पृष्ठ ४०) में भी मिलता है।

३. 'अग्र' विशेषण का महत्व और हरिजी की शाखा

हरिजी ने अग्रवालों से पृथक होने के बाद भी अपने महान अग्रवंश की स्मृति को चिरस्थायी रखने के लिए अपने नाम के आगे 'अग्र' विशेषण लगाया और स्वयं को अग्रहरि कहलाने लगे। 'दिलवारी वैश्य इतिहास' (पृष्ठ १६७) के अनुसार, वे अग्रवाल जो हरिजी की विचारधारा या शाखा से जुड़े, वे 'अग्रहरि' नाम से प्रसिद्ध हुए। यह हमारी एक विशिष्ट शाखा का प्रतिनिधित्व करता है।
४. 'अग्रहार' शब्द और वैश्यवर्ग से संबंध

शब्दकोश में 'अग्रहार' शब्द के तीन मुख्य अर्थ दिए गए हैं:
  1. राजा की ओर से ब्राह्मणों को दी हुई भूमि
  2. देवता को अर्पित संपत्ति
  3. धान्य से भरे खेत

चूँकि हमारे पूर्वज वैश्य वर्ग के रूप में प्रमुख रूप से कृषि कार्य में संलग्न थे, यह संभव है कि धान्य से परिपूर्ण खेतों के स्वामियों के लिए 'अग्रहारी' शब्द का प्रयोग हुआ हो। अथवा महाराजा अग्रसेन स्वयं एक महान दानी थे, संभव है उन्होंने ब्राह्मणों को कोई भूभाग या संपत्ति अर्पित की हो, और उस भूभाग में निवास करने वाले लोग 'अग्रहारि' कहलाने लगे हों।

५. 'वाल' और 'हारी' शब्दों का प्रयोग: क्षेत्रीय भिन्नता का प्रभाव

'वाल' और 'हारी' दोनों ही शब्द संबंध सूचक हैं, जिनका मूल अर्थ 'रहने वाले' या 'निवासी' होता है। इस प्रकार, 'अग्रवाला' का अर्थ अग्रोहा के निवासी हैं, और ठीक उसी तरह, 'अग्र+हारी' का अर्थ भी अग्रोहा के निवासी हैं। यह प्रश्न उठता है कि कुछ ने 'वाला' और कुछ ने 'हारी' शब्द का प्रयोग क्यों किया? संभावना यह है कि प्रांतीय भेद के कारण इन भिन्न शब्दों का प्रयोग हुआ हो, जो बाद में एक निश्चित पहचान का सूचक बन गया।

६. 'अग्रोहारी' से 'अग्रहरि' तक का सफर

जिस प्रकार 'महेश्वरी' शब्द से महेश्वर नामक मूल स्थान का बोध होता है, उसी प्रकार यह माना जा सकता है कि अग्रोहा के निवासियों ने स्वयं को 'अग्रोहारी' कहा होगा। समय के साथ, 'अग्रोहारी' शब्द का परिवर्तित रूप 'अगराहारी' और अंततः हमारा नाम 'अग्रहरि' बन गया। यह भाषा विज्ञान के "प्रयत्नलाघव" या "मुख-सुख" सिद्धांत का एक उदाहरण है, जहाँ उच्चारण की सुविधा के लिए शब्दों में परिवर्तन होता है।

७. 'जाति भास्कर' में अग्रहरि का उल्लेख


'जाति भास्कर' नामक एक प्राचीन ग्रंथ में एक श्लोक आया है:

"
अग्रवालस्य वीर्येण संजाता विप्रयोषिति अग्रहारी, कस्त्रवानी, माहूरी संप्रतिष्ठिताः
" (जात भास्कर पृष्ठ २६३)

इस श्लोक के अनुसार, अग्रहारी, कस्त्रवानी और माहूरी, अग्रवाल पिता और ब्राह्मण माता की वर्ण संकर संतान हैं। पुराने स्मृतिकारों ने विविध जातियों की उत्पत्ति की व्याख्या इसी प्रकार की है।

लेकिन, यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: यदि वंश का नाम पिता पर चलता है और अग्रवाल को पिता बताया गया है, तो उनसे अन्य वंशों के नामकरण क्यों हुए?

श्री सत्यकेतु विद्यालंकार डी.लिट जैसे आधुनिक और सम्मानित विद्वानों ने इस मत का पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने 'अग्रवाल जाति का प्राचीन इतिहास' (पृष्ठ २६५) में स्पष्ट लिखा है: 'हमारी सम्मति में इसमें सत्यता नहीं है। हमारा विचार है कि अग्रवाल जाति में से ही पृथक होकर इन बिरादरियों की स्थापना हुई, वर्ण संकर के कारण से नहीं। अग्रहारी वैश्यों का अग्रवालों से घनिष्ठ संबंध है, यह बात निश्चित है।' हम अपने समुदाय के रूप में इस आधुनिक और तार्किक मत का समर्थन करते हैं।

८. महाराज अग्रसेन के पुत्र 'हरि' से संबंध की संभावना

अग्रहारी-मित्र प्रयाग के विद्वान संपादक श्री भवानी प्रसाद गुप्त का विचार है कि महाराजा अग्रसेन के पुत्र 'हरि' की संतान ही अग्रहरि वैश्य हैं। परन्तु, महाराजा अग्रसेन की १८ रानियों से उत्पन्न ५४ पुत्रों के नामों में हरि के नाम का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। इस संदर्भ में दो कल्पनाएँ की जा सकती हैं:

महाराज अग्रसेन के सबसे बड़े पुत्र का नाम विभु था। 'विभु' का अर्थ विष्णु या हरि भी होता है। संभव है कि विभु के समानार्थी 'हरि' से ही हमारे अग्रहरि वंश की उत्पत्ति हुई हो।


दूसरी संभावना अधिक तथ्यपूर्ण और तर्कसंगत लगती है। 'हरि' सीधे तौर पर अग्रसेन के पुत्र नहीं थे। चूँकि राजा और प्रजा में एक पिता-पुत्र का संबंध माना जाता था, इसीलिए हरि को महाराज अग्रसेन का 'पुत्र' कहा गया हो। संभवतः, हरिजी का महाराज अग्रसेन पर विशेष प्रभाव था, जिसने उन्हें यज्ञ में बलि जैसे हिंसात्मक कार्यों से ग्लानि उत्पन्न की और उन्हें अहिंसा की ओर मोड़ा। इस कल्पना से 'अग्रोतकान्वय' में दिए गए तथ्य और श्री भवानी प्रसाद गुप्त के तथ्य में एक सामंजस्य स्थापित हो जाता है।

९. मुग़ल काल में विभाजन: अग्रवाल और माहुर की पहचान

मुग़ल काल का समय हमारे वैश्य समाज के लिए एक चुनौती भरा दौर था, जहाँ विभिन्न परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। जिस प्रकार राजपूतों में राजा मानसिंह जैसे कुछ लोगों ने अकबर को अपनी लड़कियाँ देकर मेल बढ़ाया, वहीं राणा प्रताप जैसे वीरों ने घास की रोटी खाकर भी जंगल-जंगल भटकते हुए अंत तक अकबर का मुकाबला किया; यही स्थिति हमारे वैश्य समाज में भी थी।

वैश्यों के एक वर्ग ने राज्य के साथ मेल-मिलाप बढ़ाकर अपना यश और वैभव बढ़ाया, और वे मुसलमान छावनियों में 'मोदी' जैसे महत्वपूर्ण पदों पर प्रतिष्ठित हुए। वहीं, दूसरे वर्ग ने अपनी आन-बान-शान और आत्म-सम्मान के लिए विदेशी शासकों से टक्कर ली। ऐसे स्वाभिमानी और राष्ट्रभक्त वैश्य, मुगल काल में पददलित हुए और उन्हें अपमानजनक रूप से 'माहुर' (विष की गाँठ अर्थात शत्रु) नाम से संबोधित किया जाने लगा। इस प्रकार, अकबर के शासन काल (सन १५५६ से १६०५) के मध्य अग्रवालों के दो मुख्य भेद हो गए:
  1. अग्रवाल
  2. माहुर
'अग्रोतकान्वय' (पृष्ठ १०८) में भी माहुर और अग्रहरि को एक ही बताते हुए उल्लेख किया गया है: 'गोत्रों की समानता के कारण यह जाति अग्रवालों की एक शाखा है और बिहार के वर्तमान माहुर वैश्य भी इसी वर्ग की शाखा हैं।' यह उद्धरण मुगलों को डोला न देने की हमारी बहु प्रचलित किंवदंती का भी समर्थन करता है, जो हमारे समुदाय के स्वाभिमान को दर्शाता है।

१०. 'अग्रहार भूमि' से 'अग्रहरि' की व्युत्पत्ति

बाबू सीताराम एडवोकेट द्वारा रचित 'अग्रहरि जाति की उत्पत्ति' में लेखक ने 'अग्रहार भूमि' के निवासियों को 'अग्रहरि' कहा है। अनेक ग्रंथों के उद्धरणों से इस बात की पुष्टि होती है कि पंजाब प्रांत के हिसार जिले की फतेहबाद तहसील से सात मील दूर सिरसा-दिल्ली सड़क के किनारे अग्रजनपद था। पुरातात्विक विभाग की खुदाई में प्राप्त मुद्राओं पर भी 'अग्रोदक' शब्द लिखा हुआ है। सन १९३६ की खुदाई में प्राप्त ताम्र सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में 'अगोद के अगाच जनपद' शब्द अंकित हैं।

श्री बावन शिवराम आपटे के संस्कृत-हिंदी कोश (पृष्ठ १२०८) में अग्रहार शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में लिखा गया है कि अग्रहार भूमि में हरि और हर के मंदिर आमने-सामने हैं, इसी से अग्रहार शब्द बना। श्री बाबू सीताराम जी का एक और मत है कि 'अग्रहरि' शब्द की व्युत्पत्ति 'अग्रऋषि' से ही संबंधित है। इसके अतिरिक्त, शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार भी हो सकती है: अग्रऋषि की हरि उपासक संतान जो अपनी जाति को अपने पूर्वज अग्रऋषि एवं उपास्य देव हरि के नामों से विभाजित करना चाहती थी, उन्होंने स्वयं को 'अग्रहरि' संज्ञा से संबोधित किया।

यह पुस्तिका (अग्रहरि जाति की उत्पत्ति) अनेक प्रामाणिक ग्रंथों के उद्धरणों द्वारा हमारी 'अग्रहरि' जाति की प्रामाणिकता पर प्रकाश डालती है। अग्रजनपद, अग्रोहा आदि ऐतिहासिक स्थान हैं। मेरे मतानुसार, अग्रोहा निवासियों के लिए 'अग्रोहारी' शब्द प्रयुक्त हुआ हो, जिसका परिवर्तित रूप 'अग्रहारी' या 'अग्रहरि' बन गया है।

११. युद्ध में पराजय से 'अग्रहरि' नामकरण, एक अन्य पहलू

कुछ मतों के आधार पर यह भी कहा गया है कि आगरा (अथवा अग्रोहा) में हुए एक युद्ध में पराजय के बाद, जो लोग आगरा हार कर दूसरे स्थान पर रहने लगे, वह समुदाय 'अगरा-हारी' नाम से संबोधित किया जाने लगा। यही शब्द बाद में 'अग्रहरि' अथवा 'अग्रहरी' नाम से सुविख्यात हो गया। ('अग्रहरि समाज मासिक अक्टूबर १९६७ पृष्ठ २८')

१२. राजा हरि के नाम पर 'अग्रहरि' का प्रचलन

एक मत यह भी है कि राजा अग्रसेन की पाँचवीं पीढ़ी में राजा हरि हुए, और उन्हीं राजा हरि के नाम पर 'अग्रहरि' शब्द प्रचलित हो गया। हालांकि, हमारे समुदाय ने दो महान राजाओं, अग्रसेन और हरि, के नाम पर अपना नाम अग्रहरि रखा हो, यह मत विशेष तर्कसंगत नहीं लगता है।

१३. खान-पान और संस्कृति के आधार पर विभाजन

कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह समुदाय खान-पान, प्राचीनतम संस्कृति व ईश्वर को अधिक मानता था इससे 'अग्र' शब्द के साथ हरि शब्द जोडकर अग्रवालों से पृथक बिरादरी अग्रहरि बनाली।

इन विशिष्ट मतों के अतिरिक्त अनेक विद्वानों ने अग्रहरि शब्द की व्युत्पत्ति बताने का प्रयास किया है परन्तु लगभग सभी मत उपरोक्त मतों एवं तर्कों के अन्तर्गत ही आते हैं। इस प्रकार विचार मंथन करने से कुछ तथ्य सामने आते हैं - 'अग्रहरि' व 'अग्रहारी' शब्द में से कौन सा शब्द उपयुक्त है?

अग्रहरि जाति का सम्बन्ध निर्विवाद रूप से अग्रवालों से है। साथ ही महाराज अग्रसेन का सम्बन्ध भी अग्रहरि जाति से है।

अग्रवालों से किसी कारण विशेष से यह बिरादरी पृथक हुई। गुलाबचन्द एरन के मतानुसार सन ११९४ ई. में अग्रहरि जाति अग्रवाल जाति से पृथक हो गई। यह जाति भी अग्रवंश की एक शाखा ही है।
(अग्रवाल जाति का प्रामाणिक सचित्र इतिहास- गुलाबचन्द एरन, ६६ पृष्ठ)

अग्रहरि जाति शुद्ध सात्विक भोजन करने वाली यज्ञोपवित धारण करने वाली है। अग्रवालों के समान ही यह भी अति प्राचीन है। परन्तु अल्प संख्यक होने के कारण अग्रवालों के समान विशेष जन प्रसिद्ध नहीं हो सकी।

'अग्रहरि' और 'अग्रहारी' दोनों ही शब्द एक ही बिरादरी के लिये प्रयुक्त किये गये हैं। प्रान्तीय भेद व प्रयत्नलाघव मुख-सुख (भाषा विज्ञान के सिद्धान्त) के कारण शब्दों को तोड़ा मरोड़ा जा सकता है। कुछ भाई अपने को 'अग्रोहारी' भी बताते हैं।

अग्रहरि समाज की होनहार बेटी बनी जज, पीसीएस जे 2016 में हुआ सोनम गुप्ता का चयन


उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के प्रतिष्ठित उद्यमी एवं ओबरा विधान सभा से पूर्व बसपा प्रत्याशी सुभाष अग्रहरि की बेटी सोनम गुप्ता ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की पीसीएस जे 2016 परीक्षा उत्तीर्ण करके जज बन गयी है। यह उनके कड़े परिश्रम का परिणाम है। परीक्षा उत्तीर्ण होने पर सोनम बेहद खुश है। शुक्रवार 13 अक्टूबर 2017 को देर शाम उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने UPPCS-J 2016 का अंतिम परिणाम घोषित कर दिया।  यूपीपीसीएस जे की लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद 218 पदों का चयन परिणाम घोषित हुआ है, जिनमें सोनम गुप्ता ने 101 वाँ स्थान पाकर अग्रहरि समाज का नाम रोशन किया है।





बता दें कि सोनम ओबरा स्थित सेक्रेट हार्ट कान्वेंट स्कूल की छात्रा रही है।  जानेमाने कारोबारी व समाजसेवी सुभाष अग्रहरि की सबसे छोटी पुत्री है। साल 2015 इनकी बड़ी बेटी श्वेता गुप्ता (IES Officer) का चयन भारतीय अभियांत्रिकी सेवा में हुआ था।  इस वर्ष सोनम गुप्ता ने यूपी पीसीएस जे की प्री, मेन्स के बाद इंटरव्यू परिणाम में सफलता हासिल कर जज बनने का सपना पूरा कर पूरे अग्रहरि वैश्य समाज का मान बढ़ाया है। कड़ी मेहनत कर सफलता हासिल करने के लिए नियमित पढ़ाई पर ध्यान लगाकर सोनम ने अपने माता-पिता के सपने को साकार किया है। 


सुभाष अग्रहरि के दो बड़ी बेटियो में एक एमबीबीएस डॉक्टर है तो एक आई०ई०एस० अधिकारी है। अब तीसरी बेटी भी जज बन गयी। इस सफलता पर माता पिता, क्षेत्रवासियों व स्वजातीय बंधुओ सहित परिजनों ने ख़ुशी जाहिर की है।

हम आशा करते हूं कि कु. सोनम गुप्ता इसी प्रकार भविष्य मे अग्रहरि समाज एवं अपने माता पिता का नाम रोशन करेंगी और अपने अभीष्ट लक्ष्य को यथा समय प्राप्त करेंगी। आज हम सभी को गर्व करना चाहिए कि हमारे समाज के युवा शिक्षा, खेल एवं राजनीति व अन्य क्षेत्रों  में नित नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं जो समाज के लिए गौरव की बात हैं।