अग्रहरि जाति की उत्पत्ति और ऐतिहासिक जड़ें
अंग्रेजी लेखकों के अनुसार, सन् 1911 में अग्रहरि वैश्य जाति की अनुमानित संख्या लगभग दो हज़ार थी। ये मुख्य रूप से जबलपुर, रायपुर, बिलासपुर और तत्कालीन रियासतों में बसे हुए थे। अग्रहरि वैश्य स्वयं को मूलतः वैश्य जाति से संबंधित मानते हैं और ब्राह्मणों की तरह यज्ञोपवीत धारण करते हैं। अग्रवाल वैश्यों के समान ही, ये भी स्वयं को ऐतिहासिक नगरों आगरा और अग्रोहा से जुड़ा हुआ मानते हैं, जो इनके अग्रवालों से घनिष्ठ संबंधों को दर्शाता है।
श्री नेसफील्ड ने अपनी पुस्तक 'Tribes and Castes' (Mr. Crooks) में उल्लेख किया है कि अग्रवाल और अग्रहरि दोनों जातियाँ कभी एक ही वंश की शाखाएँ थीं। उनके मतभेद का कारण "किसी मामूली खाने-पीने की बात पर आपस में विवाद" होना बताया गया है, जिसके परिणामस्वरूप वे अलग हो गईं।
'अग्रवाल जाति के प्राचीन इतिहास' में भी यह जानकारी मिलती है कि मध्यप्रांत और बनारस में 'अग्रहरि' नामक एक देशज जाति मौजूद थी, जिसे अब अग्रवालों से पृथक माना जाता है। हालांकि, ये लोग भी अपने मूल निवास स्थान के रूप में अग्रोहा और आगरा का ही उल्लेख करते हैं। श्री नेसफील्ड और श्री रसेल ने अनुमान लगाया कि इन अग्रहरि वैश्यों का अग्रवालों से गहरा संबंध रहा है, लेकिन किसी समय हुए मतभेद के कारण अग्रहरियों की एक पृथक बिरादरी का गठन हो गया।
प्रसिद्ध इतिहासकार सत्यकेतु विद्यालंकार अपनी पुस्तक "अग्रवाल जाति का प्राचीन इतिहास" (पृष्ठ 264) में इस अलगाव को और स्पष्ट करते हुए लिखते हैं:
"यह जाति अग्रवंश की ही एक शाखा है। किसी तुच्छ बात पर आपसी विवाद के कारण इन्होंने अग्रवालों से स्वयं को पृथक कर लिया। अग्रवाल नाम से एक दल विख्यात रहा, जबकि दूसरा दल, जिसकी संख्या कम थी, भिन्न आहार के कारण 'अलगाहारी' कहलाया। कालांतर में यही नाम 'अग्राहारी' व 'अग्रहरि' में परिवर्तित हो गया।"
एक अन्य प्रचलित मत के अनुसार, इस जाति के पूर्वज अग्रवाल थे जो अग्रोहा में रहते थे। अग्रोहा के नष्ट हो जाने के बाद, वे अन्य नगरों में बस गए। इन नगरों के स्थानीय लोग उन्हें 'अग्रहा हारे' (आगरा से हारे हुए) कहने लगे, और यही शब्द धीरे-धीरे 'अग्रहरि' में बदल गया। सन् 1894 ई. तक, यह जाति अग्रवालों से स्पष्ट रूप से अलग मानी जाने लगी। अग्रहरि जाति भी अग्रवालों की भांति खान-पान में शुद्धता और यज्ञोपवीत धारण करने की परंपरा का पालन करती है।
जनगणना आयुक्त ने भी अग्रहरियों और अग्रवालों के बीच के संबंध को स्वीकार करते हुए लिखा है:
"It may supply an explanation of the divergence of the Agrahari from the Agrawalas. There is no doubt that they are closely connected with the Agrawalas." (C&T, p. 133-134)
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी कृति 'जययौद्धेय' की भूमिका में इन संबंधों को और व्यापक संदर्भ में समझाते हुए लिखा है:
"अग्रवाल, अग्रहरि, रोहतगी, रस्तोगी, श्रीमाल, ओसवाल, वर्णवाल आदि वैश्य जातियाँ यौद्धेयों की संतान हैं, जो गणेच्छेद के बाद तलवार छोड़ तराज़ू उठाने को मजबूर हुईं।"
इन ऐतिहासिक संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि अग्रहरि, अग्रवालों की ही एक उपशाखा है, जिसने समय, क्षेत्र, रीति-रिवाज और विचारों की भिन्नता के कारण अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना ली है।
आजीविका, भौगोलिक फैलाव और आधुनिक प्रगति
अग्रहरि समुदाय की आजीविका पारंपरिक रूप से दुकानदारी (मिठाई, किराना), कृषि व्यापार और नौकरी पर आधारित रही है। यह जाति उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि में फैली हुई है।
मुंबई, महाराष्ट्र में हमारे समाज के लोग मुख्यतः सब्जी बेचने के व्यवसाय में सक्रिय हैं। साथ ही, तमाम युवा बड़ी कंपनियों में नौकरी कर अपनी तरक्की कर रहे हैं, और नई पीढ़ी शिक्षा हासिल कर उद्यमिता (entrepreneurship) की ओर भी बढ़ रही है। यह देखकर खुशी होती है कि बहुत से लोग सरकारी नौकरियों जैसे आईएएस, आईपीएस, आईएफएस आदि में भी सफल होकर उच्च पदाधिकारी बन चुके हैं।
हालांकि, कई स्थानों पर 'अग्रहरि' नाम अभी भी अपरिचित है, और संदर्भ के लिए लोगों को अग्रवाल कहा जाता है। स्थानीय लोग अक्सर उन्हें उनके व्यवसाय के आधार पर 'महाजन', 'बनिया', 'सेठ', 'हलवाई' आदि नामों से पुकारते हैं।
आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति
आर्थिक स्थिति: अग्रहरि समाज परंपरागत रूप से सरल जीवनशैली अपनाता आया है। हमारे लोग, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं, जहां कई सदस्य ठेला, खोमचा, या छोटी दुकानें चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। हालांकि, मध्यमवर्गीय वर्ग भी तेजी से बढ़ रहा है, और कुछ परिवार संपन्नता की ओर बढ़ रहे हैं। यह स्पष्ट है कि अग्रहरि समाज मेहनत और लगन से अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है।
शैक्षणिक स्थिति: शैक्षणिक क्षेत्र में भी अग्रहरि समाज ने पिछले दशक में अभूतपूर्व प्रगति की है। जहां पहले ग्रामीण इलाकों में शिक्षा को उतना महत्व नहीं दिया जाता था, वहीं अब लड़के और लड़कियां समान रूप से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित हैं। खासकर शहरी क्षेत्रों में हमारे युवा शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर रहे हैं और नौकरी, सरकारी सेवा एवं उद्यमिता के क्षेत्र में सफल हो रहे हैं। यह बदलाव हमारे समाज की सकारात्मक सोच और प्रगति की सबसे बड़ी मिसाल है।
जनगणना के लिए जागरूकता
हमारी जाति अभी भी ओपन (सामान्य) श्रेणी में आती है, जबकि आर्थिक स्तर पर हम बहुत से अन्य समुदायों से पिछड़े हुए हैं। इसीलिए, यह समय की मांग है कि हम सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए ओबीसी (OBC) श्रेणी में आने की पहल करें। हमारे समाज के प्रतिनिधि इस दिशा में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी को बेहतर अवसर मिल सकें और वे समाज में अपनी भूमिका और भी मजबूती से निभा सकें।
अग्रहरि समाज की विशिष्ट पहचान को लेकर अभी भी लोगों में भ्रम पाया जाता है, क्योंकि हमारे समाज के लोग विभिन्न उपनाम जैसे गुप्ता, वैश्य, साव, महाजन, बनिया आदि उपयोग करते हैं। इससे न केवल हमारी असली संख्या का सही पता लगाना कठिन हो जाता है, बल्कि हमारी सामाजिक एकता पर भी असर पड़ता है।
इसलिए, हम सभी अग्रहरि समाज के सदस्यों से निवेदन करते हैं कि आगामी जनगणना में अपनी जाति का स्पष्ट और सही उल्लेख 'अग्रहरि वैश्य' के रूप में करें। ऐसा करने से न केवल हमारी असली जनसंख्या सामने आएगी बल्कि हमारे अधिकारों की लड़ाई और सामाजिक विकास के प्रयास और अधिक सशक्त होंगे।