अग्रहरि गौरव: फतेहपुर में भाजपा का कमल खिलाने वाले अग्रहरि नेता पूर्व मंत्री बाबू राधेश्याम गुप्ता


फतेहपुर की राजनीति की बात होती है तो कुछ नाम अपने आप सामने आ जाते हैं। उन्हीं में एक नाम है राधेश्याम गुप्ता। वे उन नेताओं में से हैं जिन्होंने राजनीति को केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि संगठन, कार्यकर्ताओं और जनता के साथ लगातार जुड़ाव बनाए रखा। जिस दौर में उत्तर प्रदेश की राजनीति अस्थिरता और बदलाव से गुजर रही थी, उस समय फतेहपुर में भाजपा को मजबूती देने वालों में उनका योगदान अहम रहा।

राधेश्याम गुप्ता का जन्म 5 मार्च 1935 को फतेहपुर जनपद में हुआ। उनके माता-पिता सादा जीवन जीने वाले, अनुशासन और मेहनत में विश्वास रखने वाले लोग थे। घर का माहौल ऐसा था जहाँ जिम्मेदारी और समाज के प्रति सोच स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और शुरुआती वर्षों में व्यवसाय से जुड़े। यही व्यावसायिक अनुभव आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन में काम आया, लोगों को समझना, निर्णय लेना और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना।

1990 का दशक देश और प्रदेश दोनों के लिए बड़ा बदलाव लेकर आया। कांग्रेस का दबदबा कमजोर हो रहा था और राजनीति में वैचारिक साफ़गोई की मांग बढ़ रही थी। इसी समय भाजपा और संघ से जुड़ा संगठनात्मक काम तेज़ हुआ। फतेहपुर में भी राजनीति किसी एक दिशा में नहीं थी। ऐसे माहौल में राधेश्याम गुप्ता भाजपा के उन नेताओं में उभरे जो जमीन से जुड़े थे, कार्यकर्ताओं के बीच रहते थे और संगठन की बात समझते थे। पार्टी में उन्हें एक भरोसेमंद व्यक्ति माना जाने लगा। उस समय के बड़े नेता, खासकर अटल बिहारी वाजपेयी, उन्हें गंभीरता से लेते थे। वें अटल बिहारी वाजपेयी के काफी करीबी माने जाते थें। 

1991 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। वे संगठन के काम में और ज़्यादा सक्रिय हुए। 1993 का चुनाव फतेहपुर के लिए यादगार साबित हुआ। बाबरी विध्वंस के बाद देशभर में रामलहर साफ़ दिखाई दे रही थी। भाजपा ने उन्हें फतेहपुर सदर से उम्मीदवार बनाया। उस चुनाव में एक दिलचस्प दृश्य था, एक तरफ भाजपा के लिए अटल बिहारी वाजपेयी की सभा और दूसरी तरफ कांग्रेस के समर्थन में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की रैली। अटल जी की सभा ने माहौल बदल दिया और राधेश्याम गुप्ता पहली बार विधायक बने। उसी चुनाव के साथ फतेहपुर में भाजपा का कमल पहली बार खिला।

इसके बाद 1996 में उन्होंने दोबारा जीत हासिल की। जनता का भरोसा उनके साथ था। 2002 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 2007 में वे फिर से विधानसभा पहुँचे। यह बताता है कि वे केवल किसी एक लहर के नेता नहीं थे। उनकी प्रशासनिक समझ को देखते हुए उन्हें कल्याण सिंह सरकार में संस्थागत वित्त मंत्री बनाया गया। बाद में राजनाथ सिंह सरकार के समय उन्होंने कानून और न्याय से जुड़े दायित्व भी संभाले। ये जिम्मेदारियाँ उनके अनुभव और संतुलन का प्रमाण थीं।

वे ज़्यादा बोलने से ज़्यादा काम करने में विश्वास रखते थे। संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को साथ रखना और क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान देना, यही उनकी शैली रही। सामाजिक स्तर पर भी वे जुड़े रहे और अपने समुदाय सहित आसपास के लोगों से निरंतर संवाद बनाए रखा। उन्होंने यह दिखाया कि राजनीति में रहते हुए समाज से दूरी बनाना ज़रूरी नहीं है।

आज उनकी राजनीतिक यात्रा को उनके पुत्र विकास गुप्ता आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्होंने लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर जनता का भरोसा कायम रखा है। यह भरोसा केवल एक नाम का नहीं, बल्कि उस काम और व्यवहार का परिणाम है जो वर्षों से लोगों ने देखा है।

फतेहपुर की राजनीति में भाजपा की जो जगह आज दिखती है, उसकी नींव रखने वालों में राधेश्याम गुप्ता का नाम हमेशा लिया जाएगा। वे आज भी एक ऐसे नेता के रूप में याद किए जाते हैं जिन्होंने कठिन समय में संगठन का साथ दिया और क्षेत्र को एक स्पष्ट राजनीतिक दिशा देने में भूमिका निभाई।


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