अग्रहरि गौरव: पहले ही प्रयास में न्यायिक सेवा में चयन, फिर हाईकोर्ट की न्यायपीठ तक पहुँचे, जानिए न्यायमूर्ति शरद कुमार गुप्ता (अग्रहरि) का जीवन और योगदान


भारतीय न्यायपालिका में ऐसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपने कार्य से अपनी अलग पहचान बनाई। न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता अग्रहरि भी उन्हीं में से एक हैं। लगभग चार दशक तक न्यायिक सेवा में रहते हुए उन्होंने सिविल न्यायाधीश, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश, राज्यपाल के विधिक सलाहकार, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा बाद में छत्तीसगढ़ भू संपदा अपीलीय अधिकरण (CG Real Estate Appellate Tribunal) के प्रथम अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया।

अग्रहरि समाज से आने वाले न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता का जन्म 14 अप्रैल 1959 को राजनांदगांव (वर्तमान छत्तीसगढ़) में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय श्री बी. एस. गुप्ता जिला एवं सत्र न्यायाधीश थे। परिवार में न्यायिक सेवा की परंपरा थी, जिसने प्रारंभ से ही उनके व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि को प्रभावित किया।

प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्होंने रीवा स्थित अवधेश प्रताप विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में विज्ञान स्नातक (बी.एससी.) तथा जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से प्रथम श्रेणी में एल.एल.बी. की उपाधि प्राप्त की। विधि की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने न्यायिक सेवा को अपना लक्ष्य बनाया और वर्ष 1985 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा परीक्षा प्रथम प्रयास में उत्तीर्ण कर सिविल न्यायाधीश के रूप में अपने करियर की शुरुआत की।

न्यायिक सेवा का यह प्रारंभ आगे चलकर एक लंबे और विविध अनुभवों से भरे सफर में बदल गया। लगभग बत्तीस वर्षों तक उन्होंने न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर कार्य किया। इस दौरान वे सिविल न्यायाधीश, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश तथा प्रधान न्यायाधीश (परिवार न्यायालय) रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने आर्थिक अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ (Economic Offences Wing - EOW) के विधिक सलाहकार तथा छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के विधिक सलाहकार के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं। न्यायिक कार्य के साथ-साथ प्रशासनिक दायित्वों का यह अनुभव उनके व्यावसायिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता रहा।

उनकी सेवाओं और अनुभव को देखते हुए 27 जून 2017 को उन्हें छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। इसके बाद 2 सितम्बर 2019 को वे उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश बने। उच्च न्यायालय में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने दीवानी, आपराधिक, संवैधानिक तथा प्रशासनिक कानून से जुड़े अनेक मामलों की सुनवाई की। मार्च 2021 तक वे न्यायिक दायित्वों का निर्वहन करते रहे।

उच्च न्यायालय से कार्यमुक्त होने के बाद छत्तीसगढ़ शासन ने उन्हें छत्तीसगढ़ भू संपदा अपीलीय अधिकरण (CGREAT) का प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया। रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 के तहत गठित यह अधिकरण राज्य में रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) के आदेशों के विरुद्ध दायर अपीलों की सुनवाई करता है। न्यायमूर्ति श्री गुप्ता के कार्यकाल में अधिकरण की संस्थागत कार्यप्रणाली को व्यवस्थित रूप मिला। 2 जुलाई 2022 को रायपुर के मौलश्री विहार स्थित अधिकरण के नवीन भवन का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने वर्चुअल माध्यम से किया।

न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता का परिवार भी शिक्षा और सार्वजनिक सेवा से जुड़ा रहा है। उनकी पत्नी श्रीमती मंजूषा गुप्ता सामाजिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों में सक्रिय रही हैं तथा समय-समय पर महिलाओं के लिए योग प्रशिक्षण कार्यक्रमों से भी जुड़ी रही हैं। उनके पुत्र एडवोकेट श्रेष्ठ अग्रहरि विधि व्यवसाय से जुड़े हैं, जबकि पुत्री एडवोकेट समीक्षा गुप्ता अग्रहरि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत रही हैं।

उनके छोटे भाई श्री सुधीर कुमार गुप्ता भारतीय रेल में वरिष्ठ अभियंता रहे और आगे चलकर बिलासपुर रेलवे जोन में प्रिंसिपल चीफ इंजीनियर तथा बाद में जबलपुर रेलवे जोन के महाप्रबंधक (जनरल मैनेजर) के पद तक पहुँचे। दूसरे छोटे भाई डॉ. संजय कुमार गुप्ता चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े रहे हैं।

अग्रहरि समाज के इतिहास में न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता का नाम एक विशेष उपलब्धि के साथ दर्ज है। उपलब्ध सामुदायिक अभिलेखों के अनुसार वे अग्रहरि समाज से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने वाले प्रथम व्यक्ति हैं। उनकी यह उपलब्धि समाज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जाती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का विषय है।

सिविल न्यायाधीश के रूप में शुरू हुई न्यायमूर्ति श्री शरद कुमार गुप्ता अग्रहरि की यात्रा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और आगे चलकर छत्तीसगढ़ भू संपदा अपीलीय अधिकरण के प्रथम अध्यक्ष तक पहुँची। न्यायिक सेवा के विभिन्न स्तरों पर उनका अनुभव, प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन और संस्थागत विकास में उनकी भूमिका भारतीय न्यायपालिका में उनके दीर्घ योगदान को रेखांकित करती है। उनके जीवन का यह सफर इस बात का उदाहरण है कि निरंतर अध्ययन, अनुशासन, निष्पक्षता और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर सार्वजनिक जीवन में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया जा सकता है।


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